वकीलों की हड़ताल का 5वां दिन: रजिस्ट्री ठप, करोड़ों का कारोबार प्रभावित, समाधान की तलाश जारी

अंकित शर्मा, आईआईएमटी न्यूज, नोएडा। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दस्तावेज पंजीकरण प्रक्रिया में ई-पंजीकरण व्यवस्था लागू करने के फैसले के विरोध में नोएडा के वकीलों की हड़ताल सोमवार को पांचवें दिन भी जारी रही। सेक्टर-33ए स्थित निबंधन कार्यालय में अधिवक्ता लगातार धरना देकर सरकार के निर्णय का विरोध कर रहे हैं। हड़ताल के कारण पिछले पांच दिनों से एक भी रजिस्ट्री नहीं हो सकी है, जिससे न केवल आम नागरिकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है बल्कि करोड़ों रुपये के राजस्व और संपत्ति कारोबार पर भी असर पड़ा है।

सोमवार को भी बड़ी संख्या में लोग जमीन, फ्लैट और अन्य संपत्तियों की रजिस्ट्री कराने के लिए निबंधन कार्यालय पहुंचे, लेकिन वकीलों के कार्य बहिष्कार के कारण उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। कई लोग दूर-दराज के क्षेत्रों से जरूरी दस्तावेजों के साथ पहुंचे थे, लेकिन कार्यालय में कामकाज ठप होने से उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। संपत्ति खरीद-बिक्री से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि लगातार पांच दिनों से रजिस्ट्री न होने के कारण करोड़ों रुपये के सौदे अटक गए हैं।

वकीलों का कहना है कि सरकार द्वारा ई-पंजीकरण व्यवस्था को निजी हाथों में देने की तैयारी की जा रही है, जिससे वर्षों से इस व्यवस्था से जुड़े अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों, स्टांप विक्रेताओं और अन्य कर्मचारियों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा। उनका आरोप है कि नई व्यवस्था लागू होने पर पंजीकरण प्रक्रिया में उनकी भूमिका लगभग समाप्त हो जाएगी, जिससे हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी।

जानकारी के अनुसार सरकार ने रजिस्ट्री प्रक्रिया को डिजिटल और सरल बनाने के उद्देश्य से ई-पंजीकरण व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। इसके तहत नोएडा प्राधिकरण में एक समर्पित टीम दस्तावेजों की जांच और ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करेगी। सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद दस्तावेज केवल अंतिम पंजीकरण के लिए निबंधन कार्यालय भेजे जाएंगे। सरकार का मानना है कि इससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और तेज होगी।

हालांकि अधिवक्ताओं का तर्क है कि इस व्यवस्था से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जिनका अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है। वकीलों के अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि निजी एजेंसियों को जिम्मेदारी दी जाती है तो उनकी सेवाओं का भुगतान कौन करेगा। इसके अलावा स्टांप विक्रेताओं, डीड राइटरों और वकीलों के भविष्य को लेकर भी कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आई है। अधिवक्ता यह भी पूछ रहे हैं कि निजी संस्थानों का कार्यकाल कितना होगा और वहां नियुक्त कर्मचारियों के पास पर्याप्त विधिक ज्ञान होगा या नहीं। यदि किसी दस्तावेज में त्रुटि होती है या गलत पंजीकरण हो जाता है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी, यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है।

इन सवालों को लेकर वकीलों और प्रशासन के बीच गतिरोध बना हुआ है। सूत्रों के अनुसार शासन और प्रशासनिक अधिकारियों के स्तर पर लगातार मंथन बैठकों का दौर जारी है। अधिकारियों द्वारा बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों को समझाने और समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों पर अड़े हुए हैं।

नोएडा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीण डेढ़ा ने कहा कि जब तक सरकार इस व्यवस्था को वापस नहीं लेती या वकीलों की आशंकाओं का संतोषजनक समाधान नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि यह केवल अधिवक्ताओं की लड़ाई नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की चिंता का विषय है जो वर्षों से पंजीकरण प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं।

दूसरी ओर आम नागरिकों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। जिन लोगों ने बैंक ऋण, संपत्ति हस्तांतरण और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के लिए समयबद्ध योजनाएं बनाई थीं, वे अब अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो रजिस्ट्री कार्यों का बैकलॉग और बढ़ सकता है।

फिलहाल सभी की नजरें प्रशासन और वकीलों के बीच होने वाली अगली वार्ता पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि जल्द कोई रास्ता निकलेगा, जिससे रुकी हुई रजिस्ट्रियां शुरू हो सकें और आम लोगों को राहत मिल सके।

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