हकीम से शायर कैसे बने मजरुह सुल्तानपुरी

मजरुह सुल्तानपुरी

मजरुह सुल्तानपुरी

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर

लोग साथ आते गये कारवां बनता गया

अनुराग दुबे : मजरुह सुल्तानपुरी की यह शायरी अक्सर लोगों के जुबां पर आ जाती है। मगर यह शायरी खुद सुल्तानपुरी पर सटीक बैठता है। इनका जीवन काफी उठापटक भरा रहा। सुल्तानपुरी को लोग शायर, गजलकार,गीतकार के रुप में जानते हैं। आज का युवा वर्ग भी इनकी शायरी से मुखातिब है। मजरुह सुल्तानपुरी बनने से पहले वह असरारुल हसन खान थे। शायर बनने से पहले यह एक हकीम थे। नब्ज पकडकर लोगों का हाल पल भर में बता देते थे।

लेकिन कहते हैं कि शौक बडी चीज होती है। असरारुल हसन खान की शौक ने उन्हें मायानगरी पहुंचाया। हकीमगीरी के साथ-साथ शेरो-शायरी, गीत, गजल इत्यादि करते रहे। मायानगरी पहुंचने के बाद ये पक्का हो गया था कि बॉलिवुड को एक नया गीतकार मिला गया है। मजरुह सुल्तानपुरी की विशेष बात ये थी कि इन्होंने दर्द, खुशी, इश्क और अहसास को शब्दों में बाँधा था। आज के इस हाईटेक जमाने में भी सुकून पाने के लिए लोग इनके गीतों का सहारा लेते हैं। आज उनकी पुण्यतिथी है।

जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि मजरुह सुल्तानपुरी , सुल्तानपुर के रहने वाले थे। लेकिन इनका जन्म सुल्तानपुर में नही हुआ था। इनका जन्म 1 अक्टुबर 1919 को आजमगढ़ के निजामाबाद में हुआ था। इनके पिता पुलिस इंस्पेक्टर थे। सुल्तानपुरी की पढाई-लिखाई मदरसे में हुई। मदरसे में पढने के वजह से इनकी अरबी और फारसी भाषा समृद्ध हो गयी। अरबी और फारसी के जानकार होने के वजह से इन्होंने लखनऊ आकर यूनानी दवाओं का ट्रेनिंग लेना शुरु कर दिया।

ट्रेनिंग के बाद वे हकीम बन गये। ऐसे हकीम जो लोगों की नब्ज पकड कर तबीयत का हाल बता देते थे। कमबख्त जिंदगी को कुछ और ही चाहती थी। शौक होने के वजह से सुल्तानपुरी दर्द, इश्क, खुशी और मोहब्बत को शब्दों में बाँधने का काम करने लगे। प्रख्याति और लोकप्रियता ने इनका कदम चुमा और उस समय के प्रख्यात शायरों में इनका नाम प्रचलित होने लगा। जिगर मुरादाबादी का साथ मिलने लगा। बड़े-बड़े मुशायरों में इनका आना जाना होने लगा।

सुल्तानपुरी बताते हैं कि मुशायरों से मिली तारीफ ने उनके हौसले को और भी बुलंद किया। जिगर मुरादाबादी से वे काफी प्रभावित हुए। बाद में मायानगरी के बॉलिवुड इंडस्ट्री को उन्होंने एक से बढकर एक गीत दिए। बाद में एक समय ऐसा भी आया कि सुल्तानपुरी अपने शब्दों से राजनीति को परिभाषित करने के वजह से जेल भी गये। लेकिन बडी सख्सियत होने के वजह से वो बाहर भी आ गये। अपने गीत के माध्यम से दादा साहब फाल्के पुरस्कार लेने वाले यह पहले गीतकार हैं। “चाहुंगा मैं तुझे”  गीत के लिए उन्हें बेस्ट लिरिकिस्ट अवार्ड भी मिला था।

ब्लैक एण्ड वाइट फिल्मों में उन्होंने कई तत्कालिन सुपरस्टारों के लिए काम किया। देवानंद, शम्मी कपूर, राज कपूर के लिए भी गाने लिखे। आरडी बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल सहित अन्य कई संगीत निर्देशक के साथ इन्होंने काम किया। आमिर खान, सलमान खान और शाहरुख खान के दौर को भी इन्होंने देखा। आमिर खान की पहली फिल्म “कायामत से कायामत” तक के सारे गाने इनके थे। 24 मई 2000 का वह काला दिन जिसने मजरुह सुल्तानपुरी को  काल ने अपने आगोश में ले लिया। आज भले ही सुल्तानपुरी हमारे बीच में नही हैं लेकिन इनके गाने, इनका शायरना अंदाज,  इनको याद करने पर मजबुर कर देगा। आज भी इनको पसंद करने वाले इनके गानों को सुनते हैं और गुनगुनाते हैं।