जम्मू-कश्मीर में फिर सुनाई दी ‘1990’ के आतंकी दिनों की गूंज

1990 के दशक में कश्मीर घाटी में आतंकवाद अपने चरम पर रहा। जिसमें दहशतगर्दों ने कश्मीरी पंडितों, सिखों और मुस्लिमों को चुन-चुनकर निशाना बनाया। जिसमें चिन्हित कर लोगों की हत्या, बलात्कार, और संपत्तियों पर कब्जा शुरू कर दिया। लगातार निशाना बनने के कारण घाटी में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं के मन में खासकर कश्मीरी पंडितों और सिखों के मन में डर का माहौल पैदा हो गया । इसका नतीजा यह रहा कि जो लोग सदियों से वहां रह रहे थे अपना सबकुछ छोड़ कर लाखों की संख्या में घाटी से पलायन शुरु कर दिया। सुरक्षा और रोजगार के लिए लोग दूसरे राज्यों में बसने लगे या फिर शरणार्थी शिविरों में रहने लगे। उसके बाद राज्य में कई सरकारें आई और चली गई लेकिन कश्मीरी पंडितों की राज्य में वापसी नहीं हो सकी। हालांकि बीजेपी लगातार कहती रही कि अल्पसंख्यों को राज्य में फिर से बसाया जाए।

2016 में जब मोदी सरकार ने नोटबंदी लागू की थी, तब सरकार की तरफ से तर्क दिए गए थे कि इस फैसले से आतंकवाद की वित्तीय कमर बुरी तरह से टूट जाएगी। क्योंकि पीएम मोदी और बीजेपी नेताओं का मानना था कि टेरर फंडिंग ब्लैक मनी के रूप में ही होती है। लिहाज़ा नोटबंदी करने की वजह से आतंकवाद पर नियंत्रण पाने में बड़ी कामयाबी मिलेगी। नोटबंदी के ठीक ढाई साल के बाद यानी 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने जम्मू एवं कश्मीर धारा 370 और 35 ए के तहत मिलने वाले विशेष प्रावधान को समाप्त कर पाकिस्तान सहित देश और पूरी दुनिया को चौंका दिया। उस वक्त सरकार ने जम्मू और कश्मीर का विभाजन भी कर दिया और पूरे राज्य को जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के तहत दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया। मोदी सरकार का दावा था कि जम्मू कश्मीर को प्रगति की राह पर ले जाने के लिए और आतंकवाद के खात्मे के उद्देश्य से यह दोनों निर्णय को लिया गया। इसके बाद सरकार ने घाटी में अल्पसंख्यों की राज्य में बसाने के लिए काम शुरू कर दिया जोकि पाकिस्तान को नागवार गुजर रहा है। हाल ही में कश्मीरी पंडितों को सरकार ने घाटी में नौकरियां दी हैं जिसकी वजह से कई लोग सरकार के विश्वास पर अपने मूल निवास पर वापस लौटे हैं। पिछले दिनों हुई अल्पसंख्यों की हत्या ने एक बार फिर से उनकी सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिया है। कहने का मतलब है कि पाकिस्तान कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी के प्रयासों व उनकी संपत्तियों से कब्जे हटाने की कवायद पर परेशान हो गया है। उसने फिर 1990 जैसे खूनी खेल की साजिश रचनी शुरू कर दी है। पुलिस आंकड़ों के अनुसार इस साल के अंदर आतंकवादियों ने कम से कम 30 लोगों की गोलीमार कर हत्या की। जिस तरह से राज्य में लोगों की हत्या हो रही है उससे मोदी सरकार के उन दावों पर विपक्ष सवालिया निशान लगा रहा है। हालांकि जानकारों का मानना है कि घाटी में गैर मुस्लिम लोगों की हत्या 2008 से ही लगातार जारी है, लेकिन अनुच्छेद 370 हटने के बाद अलगाववादियों में कहीं न कहीं परेशानी पैदा कर दी जिसका परिणाम सभी के सामने है। दूसरी तरफ सरकार ने कश्मीर छोड़ चुके अल्पसंख्यकों को अचल संपत्तियों पर फिर से कब्जा देने का कार्यशुरू कर दिया लेकिन सरकार की तरफ से इस कोई ठोस योजना नहीं बनाई। लगातार हो रही हत्याओं के लेकर लोगों में सरकार के खिलाफ काफी गुस्सा देखा जा रहा है। वहीं कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी सरकार को इस मुद्दे पर घेरा है। उनका कहना है कि कश्मीर में हिंसा की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। आतंकवाद ना तो नोटबंदी से रुका ना धारा 370 हटाने से केंद्र सरकार सुरक्षा देने में पूरी तरह असफ़ल रही है। दूसरी तरफ ध्यान देने वाली बात है कि जब से अफगानिस्तान में तालिबान ने सत्ता पर कब्जा किया है तब से भी जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यकों को तेजी से निशाना बनाया जा रहा है। खास बात यह कि इस तरह की घटनाओं को श्रीनगर में अंजाम दिया जा रहा है जो कि सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी डॉ. एसपी वैद का मानना है कि इस तरह के हालात 1990 के दशक में भी पैदा किए गए थे। अब आईएसआई ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है तो भारत को भी फ्रांस की तरह कट्टरता और आतंकवाद पर नए सिरे से सोचने की जरूत है और इस बात का भी पता लगाना चाहिए कि शिक्षा की आड़ में कही कट्टरता के बीज तो नहीं बोए जा रहे हैं। हालांकि सरकार भी इन घटनाओं को लेकर सचेत दिखाई दे रही है जिसको लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की है। बैठक में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन और संभावित खतरों को लेकर चर्चा की गई। बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल, गृह सचिव अजय भल्ला और इंटेलीजेंस ब्यूरो के प्रमुख अरविंद कुमार के अलावा सुरक्षा एजेंसियों के आला अधिकारी, डीजी सीआरपीएफ कुलदीप सिंह, डीजी बीएसएफ पंकज सिंह उपस्थित रहे। सुरक्षा के मुद्दे पर हुई यह बैठक करीब दो घंटे 45 मिनट चली। बैठक में लक्षित हत्याओं पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक के बाद माना जा रहा है कि आतंकियों और चरमपंथियों पर अब कोई बड़ा एक्शन सरकार की तरफ से लिया जा सकता है क्योंकि घा में अल्पसंख्यक अपनी और अपने परिवारों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।

लेखक आईआईएमटी कॉलेज समूह से जुड़े हुए हैं।