कोरोना महामारी के दौरान बढ़ा मानसिक अवसाद

भारत

डॉ. योगेंद्र पांडेय

असिस्टेंट प्रोफेसर, बीजेएमसी, आईआईएमटी कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट

कोविड-19 का अब तक दौर 21वीं सदी के सबसे भयावह दौर के रूप में याद किया जायेगा। 2020 और 2021 में भारत में इस बीमारी ने जिस तेजी से अपने पांव पसारे और हर तरफ पहले से चल रही व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया, उससे हमारे समाज में बहुत बदला है। स्वास्थ्य चिंताओं के साथ आर्थिक, सामाजिक और मानसिक त्रासदी लोगों को झेलनी पड़ी है। बच्चे हो या युवा, बुजुर्ग हो या कामकाजी लोग, सभी इससे प्रभावित हुए हैं। सर्वाधिक प्रभाव आर्थिक स्थिति पर पड़ा है और इससे परिवार में सभी को परेशानियां झेलनी पड़ी।


परिवार में सबकी अपनी-अपनी चिंतायें सतह पर आ गई। डर, भय, रोक-टोक और आर्थिक चिंतायें हमारी मनःस्थिति पर बुरा प्रभाव डालने वाली रही। हमेशा घर से दूर दूसरों की चाकरी करने वाला युवा वर्ग इस महामारी का सर्वाधिक शिकार हुआ। बहुतों की नौकरियां छिन गई, कईयों की नौकरी तो थी, लेकिन कभी भी जाने का डर अलग से परेशान किये जा रहा था, कुछ के वेतन में कटौती कर दी गई थी। इससे तंग आकर कइयों ने आत्महत्या तक कर ली। लाॅकडाउन के चलते तमाम आर्थिक गतिविधियों के ठप होने से कारोबार और बजट दोनों गड़बड़ाया, लेकिन परिवार के खर्चे जस के तस थे, इन परिस्थितियों में मानसिक अवसाद को बढ़ाने का कार्य किया।


कोरोना ने बच्चों को भी खूब रूलाया। हमेशा घर के बाहर खेलने वाले बच्चों को इस महामारी के डर ने घर में कैद कर दिया गया। प्रायः घूमने के शौकीन बच्चों के लिए यह दौर किसी सजा से कम नहीं थी। जन्मदिन की पार्टी में केक खाना और गुब्बारे फोड़ने जैसी बातें उनकी आदतों में होने के बावजूद दूर कर दी गई थी। बेवजह की रोक-टोक और मोबाइल स्क्रीन पर अधिक से अधिक समय व्यतीत करने की आदतों ने बच्चों को गुमशुम और उम्र से पहले ही बड़ा बनाने वाला साबित हुआ।


घर के बुजुर्ग मां-बाप इस महामारी से भले बच गये हों, लेकिन इसके दुष्प्रभावों से कतई नहीं बच सके। कमाने वाला बेटे के नौकरी पर आंच आने पर सर्वाधिक चिंताएं मां-बाप को ही होती है और यह कोरोना काल में स्पष्टतः देखा गया। बुजुर्ग मां-बाप को अपने स्वास्थ्य की चिंताओं के बीच परिवार की खुशहाल माहौल के बरकरार रहने की चिंता ने ज्यादा परेशान किया। उनकी नजर में बच्चे चाहे जितना भी बड़े हो जाये तो भी वह बच्चे ही होते हैं, ऐसे में उनके लिए फिक्रमंद होना लाजिमी है। बुजुर्गियत में स्वास्थ्य का मामला का मामला अलग से होता ही है। इस कारण उनकी मानसिक सेहत का नासाज होना स्वाभाविक है।


यह भी देखा गया कि वर्क फ्राम होम में पति-पत्नी का एक साथ हमेशा घर पर बने रहना भी परिवार में तनाव का कारण बना। आपस में झगड़े बढ़े और कहीं बाहर जाने की पाबंदी के कारण परिवार में तनाव का वातावरण बढ़ता गया। इससे लोगों को आर्थिक और स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक दुष्प्रभाव का सामना करना पड़ा।


हमारे देश की विडंबना यह है कि कि मानसिक स्वास्थ्य के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है। सरकार की तरफ से भी इस मामले में कोई पर्याप्त कदम अभी तक नहीं उठाये गये हैं। यूं तो भारत सरकार की तरफ से 10 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति को लागू किया गया था, परन्तु इस तरफ कोइ मजबूत ढांचा का निर्माण अभी भी प्रतीक्षित है। मानसिक स्वास्थ्य के तहत अवसाद, चिंता, परेशानी, तनाव आदि लक्षण आते हैं, जिन पर लोग बात करने से भी कतराते हैं। मानसिक अवसाद के लक्षण रोगी के हाव-भाव से भी पता चल जाता है। जब कोई बार-बार मरने की बात करे, शराब या किसी अन्य नशे में अप्रत्यासित वृद्धि कर दे, आत्मग्लानि की बातें करे, लापरवाही में खुद को जोखिम में डाले तथा उदास या गुमशुम रहने लगे तो उसे एक बार मानसिक रोग विशेषज्ञ से दिखाने की जरूरत होती है। ये सभी लक्षण उसके मानसिक तनाव और अवसाद की तरफ इंगित करते हैं। इस बीमारी को लोग अछूत की तरह देखते हैं और इसके बारे में अक्सर लोग बातों को छिपा ले जाते हैं। लोगों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे कहीं न कहीं मानसिक अवसाद की वजह सर्वाधिक होती है।


एक शोध रिपोर्ट में पाया गया कि कोरोना काल में युवाओं की मानसिक परेशानियां दोगुनी से अधिक हो गई। पहले हर दस युवा में से किसी एक में चिंता और अवसाद के लक्षण मिलते थे, लेकिन कोरोना काल में यह संख्या हर चार में से एक में पायी जाने लगी। यह सब कोरोना वायरस से संक्रमित होने का डर, नौकरी और कारोबार के जाने की चिंता और लाॅकडाउन जैसी परिस्थितियों से उत्पन्न स्थिति के कारण ज्यादा देखा गया। इसका असर लोगों के शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप पर भी बराबर देखने को मिला।


अब लाॅकडाउन खत्म हो गया है। परिस्थितियां पुराने ढर्रे पर आने लगी हैं, लेकिन तीसरी लहर की चिंताएं और पिछले दो सालों के भारी नुकसान अब भी चिंतित करने वाली हैं। इससे लोगों को खुद उबरने की जरूरत है, साथ सरकार को भी इसके इलाज के लिए बेहतर प्रबंध कराने की तरफ कदम उठाने होंगे। नहीं तो आने वाले समय में यह मानसिक रूप से बीमार समाज कोरोना महामारी से भी अधिक खतरनाक साबित हो सकता है।