डॉ. अम्बेडकर की गौरवशाली परंपरा को स्थापित कर रहा है विश्वविद्यालय- प्रो. शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी

डॉ. अम्बेडकर

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महू। 1857 का जनजागरण भारत के उत्थान का सार्वकालिक उदाहरण है। स्वाधीनता के आन्दोलन में भारत के गांवों की अहम् भूमिका रही है। कुलपति प्रोफ़ेसर आशा शुक्ला के नेतृत्व में विश्वविद्यालय अकादमिक शोध एवं वैचारिक आयोजनों के माध्यम से डॉ. अम्बेडकर के दर्शन को आगे बढ़ाने के लिए कार्यरत है। उक्त बातें अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने कही। राष्ट्रीय वेब परिसंवाद डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय तथा हेरीटेज सोसाईटी द्वारा संयुक्त रूप से ‘1857 के आंदोलन में ग्रामीण अंचलों का योगदान’ विषय पर आयोजित रहा।


उद्बोधन में प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि कुलपति ने डॉ. अम्बेडकर के सामाजिक समता और राष्ट्र उत्थान के विचारों को क्रिया व्यवहार में लाने के लिए गौतम बुद्ध पीठ, ज्योतिबाफुले पीठ, सावित्रीबाई फुले पीठ, संत कबीर पीठ की स्थापना कर गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। स्वाधीनता सेनानियों पर केन्द्रित आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत 75 कार्यक्रमों की श्रंखला और उनका ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण कर उनके लोकव्यापीकरण का कार्य किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों की वीरगाथा का जिक्र करते हुए कहा कि 1857 के जनजागरण ने ग्रामीणों खास कर किसानों को जगाया और अंग्रेजों के खिलाफ एक दूसरे को प्रोत्साहित किया। आयोजन श्रृंखला की अध्यक्ष तथा डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशा शुक्ला के मार्गदर्शन तथा हेरीटेज सोसाईटी के संयुक्त प्रयास से आजादी के सेनानियों को पुनः स्मरण किया जा रहा है।


मुख्य वक्ता के रूप में आर्म्ड फोर्स हिस्टोरिकल रिसर्च सेंटर के सीनियर फेलो डॉ. अमित पाठक ने स्वतंत्रता के संघर्ष में 1857 का जिक्र करते हुए कहा कि इस क्रांति का जनक ग्रामीण भारत रहा है। ग्रामीणों ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होकर उनका विरोध किया। मेरठ-बागपत क्षेत्र के प्रमुख किसान नेता बाबा सारमल का जिक्र करते हुए कहा कि किसानों ने उनको बिना जातिगत भेदभाव के नेता माना और उनके साथ अंग्रेजों के विरोध में संघर्ष किया। आज भी उनके रगों में 1857 की क्रांति जिंदा है। अवध और पश्चिमी बिहार के सिपाहियों ने अंग्रेजों के द्वारा गाँवों में किए गए जुर्म को रेजीमेंट में अपने साथियों को सुनाते थे। जुर्म से लोगों में सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा हुआ। ग्रामीण जनमानस भी आजादी के संघर्ष में अपना योगदान किया।


हेरीटेज सोसाईटी पटना के महानिदेशक डॉ. अनंताशुतोष द्विवेदी ने कहा कि जिस तरीके से स्वतंत्रता के समय के ग्रामीण भारत ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया, अब वक्त आ गया है कि उन गाँवों को उचित सम्मान मिले। उन गाँवों को “सांसद आदर्श ग्राम योजना” के तहत सांसद गोद लें। सही मायने में आजादी का अमृत महोत्सव के आयोजनों का उचित न्याय ऐसे कार्यों से सम्भव होगा।


संचालन अकादमिक समन्वयक डॉ. अजय दूबे ने किया। आयोजन में प्रो. नीरू मिश्रा, प्रो. सम्पा चौबे का अकादमिक सहयोग रहा। इस अवसर पर विश्वविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं विरासत प्रेमी ने भाग लिया। डॉ. अम्बेडकर

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