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राज्यों से सुप्रीम कोर्ट ने मांगा धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने पर जवाब

प्रफुल्ल शर्मा (ग्रेटर नोएडा)

शार्ष कोर्ट ने धर्मांतरण विरोधी कानूनों पर रोक लगाने की मांग पर सुनवाई करते हुए युपी सहित अन्य राज्यों से जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को चार सप्ताह का समय जवाब दाखिल करने के लिए दिया है. उसके पश्चात याचिकाकर्ताओं को दो सप्ताह का समय दिया जाएगा। इस आदेश को प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई और विनोद चंद्रन की पीठ ने दिया है.

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्यों को अपने जवाब में हलफनामे दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है. वहीं, मामले को छह हफ्ते के पश्चात विचार के लिए तय किया है। सिटीज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस सहित याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर सभी अंतरिम आवेदनों को स्वीकार करते हुए, न्यायालय ने दस्तावेजों का संकलन तैयार करने में सुविधा के लिए अधिवक्ता सृष्टि अग्निहोत्री को याचिकाकर्ताओं की ओर से और अधिवक्ता रुचिरा गोयल को प्रतिवादियों की ओर से नोडल वकील नियुक्त किया।

वर्ष 2020 के अंतर्गत सुप्रीम अदालत ने धार्मिक धर्मांतरण से संबंधित कानूनों के खिलाफ सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस की याचिका पर नोटिस जारी किया था. फिर, जमीयत उलमा-ए-हिंद ने अलग-अलग राज्यों द्वारा बनाए गए धर्मांतरण से संबंधित कानूनों के खिलाफ 6 उच्च न्यायालयों में लंबित कई मामलों को स्थानांतरित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक स्थानांतरण याचिका दायर की.

जिन कानूनों को चुनौती दी जा रही है उनमें हिमाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2019, मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अध्यादेश 2020, उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020, और उत्तराखंड में इसी तरह का एक अधिनियम शामिल है. इन कानूनों का उद्देश्य जबरन या धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन पर रोक लगाना है, लेकिन कथित दुरुपयोग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन को लेकर इनकी आलोचना हुई है.

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