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RTE दाखिले में 35 स्कूलों की मनमानी, शिक्षा विभाग FIR की तैयारी में

रामशंकर, आईआईएमटी न्यूज। लखनऊ में शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत चयनित बच्चों को प्रवेश देने में कई निजी स्कूलों की मनमानी सामने आई है। सिटी मॉन्टेसरी स्कूल (CMS), बाल गाइड स्कूल, सेंट मेरी स्कूल और लखनऊ पब्लिक स्कूल (LPS) समेत 35 विद्यालयों ने अब तक चयनित बच्चों को प्रवेश नहीं दिया है। मामले को गंभीरता से लेते हुए शिक्षा विभाग ने सख्त रुख अपनाया है और ऐसे विद्यालयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी शुरू कर दी है।

RTE अधिनियम का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। इस कानून के तहत निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें ऐसे बच्चों के लिए आरक्षित रखी जाती हैं। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित स्कूलों को बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद राजधानी के कई प्रतिष्ठित विद्यालय नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे अभिभावकों और बच्चों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) विपिन कुमार ने बताया कि विभाग लगातार इस मामले की निगरानी कर रहा है। चयनित बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए स्कूल प्रबंधन के साथ कई दौर की बैठकें आयोजित की गई हैं। साथ ही विद्यालयों को नोटिस जारी कर नियमों का पालन करने के निर्देश भी दिए गए हैं। विभागीय प्रयासों के बाद पहले से स्थिति में सुधार जरूर हुआ है। शुरुआत में 90 से अधिक विद्यालय ऐसे थे, जिन्होंने चयनित बच्चों को प्रवेश नहीं दिया था। विभाग के दबाव और चेतावनी के बाद 60 से ज्यादा स्कूलों ने बच्चों का दाखिला ले लिया, लेकिन अभी भी 35 विद्यालय नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं।

शिक्षा विभाग का कहना है कि इन विद्यालयों को अंतिम अवसर दिया जा रहा है। जल्द ही एक और समीक्षा बैठक आयोजित की जाएगी, जिसमें स्कूलों से जवाब मांगा जाएगा। यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला और बच्चों को प्रवेश नहीं दिया गया तो संबंधित विद्यालयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने सहित अन्य कानूनी कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि शिक्षा का अधिकार कानून का उल्लंघन किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

दूसरी ओर, चयनित बच्चों के अभिभावक लगातार स्कूलों और शिक्षा विभाग के चक्कर काट रहे हैं। उनका कहना है कि बच्चों का चयन हो जाने के बावजूद विद्यालय तरह-तरह के बहाने बनाकर प्रवेश देने से बच रहे हैं। कुछ स्कूल दस्तावेजों में कमी का हवाला दे रहे हैं तो कुछ सीटों की उपलब्धता का मुद्दा उठा रहे हैं। इससे बच्चों का नया शैक्षणिक सत्र प्रभावित हो रहा है और उनकी पढ़ाई शुरू नहीं हो पा रही है।

अभिभावकों का कहना है कि सरकार द्वारा चयनित किए जाने के बाद भी यदि स्कूल दाखिला नहीं दे रहे हैं तो यह बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है। कई अभिभावकों ने शिक्षा विभाग से तत्काल हस्तक्षेप कर बच्चों को प्रवेश दिलाने की मांग की है। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए यह अवसर बेहद महत्वपूर्ण है और देरी के कारण उनका भविष्य प्रभावित हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि RTE कानून का प्रभावी क्रियान्वयन तभी संभव है जब निजी विद्यालयों को नियमों का सख्ती से पालन करने के लिए बाध्य किया जाए। शिक्षा के क्षेत्र में समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए यह कानून बनाया गया था, लेकिन यदि चयनित बच्चों को प्रवेश ही नहीं मिलेगा तो कानून का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

फिलहाल शिक्षा विभाग की नजर उन 35 विद्यालयों पर टिकी हुई है, जिन्होंने अब तक प्रवेश नहीं दिया है। आगामी बैठक और विभागीय कार्रवाई के बाद स्थिति स्पष्ट होगी। हालांकि अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि पात्र बच्चों के शिक्षा के अधिकार से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा और नियमों का उल्लंघन करने वाले विद्यालयों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

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