रोशनी शंकर (ग्रेटर नोएडा)
आज राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के मौके पर भारत में कई शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। स्कूलों में विशेष सभाएँ, जागरूकता सत्र और शिक्षा की महत्ता पर चर्चाएँ आयोजित की गईं, जहाँ छात्रों को बताया गया कि कैसे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति की नींव रखी। आधुनिक शिक्षा ढांचे, तकनीकी संस्थानों और समान अवसरों की सोच में उनका योगदान आज भी देश की प्रगति का आधार माना जाता है।
मौलाना आज़ाद को समझने और उनके विचारों की गहराई तक पहुँचने में उनकी तीन प्रमुख पुस्तकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सबसे पहले, “India Wins Freedom (इंडिया विंस फ़्रीडम / भारत को आज़ादी मिली)” भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह पुस्तक न सिर्फ उनके व्यक्तिगत अनुभवों को सामने लाती है, बल्कि आज़ादी के दौर की राजनीतिक जटिलताओं, विचारधाराओं और निर्णयों पर भी प्रकाश डालती है। इससे हमें पता चलता है कि स्वतंत्र भारत की शिक्षा और सामाजिक संरचना को लेकर उनके मन में कैसी स्पष्ट दृष्टि थी।
दूसरी किताब “Ghubar-e-Khatir (ग़ुब़ार-ए-ख़ातिर / ख़यालों की धूल)” उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को दर्शाती है। यह पत्रों का ऐसा संग्रह है जो उनके दार्शनिक दृष्टिकोण, भावनात्मक संवेदनाओं और जीवन को समझने के उनके अनोखे तरीके को उजागर करता है। इस पुस्तक के माध्यम से पाठक आज़ाद की बौद्धिक परिपक्वता और रचनात्मक सोच से रूबरू होते हैं।
इसके बाद “Islam Aur Jamhuriyat (इस्लाम और जम्हूरियत)” आती है, जो उनके राजनीतिक और धार्मिक विचारों को बेहद संतुलित और तर्कपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें आज़ाद बताते हैं कि लोकतंत्र और इस्लाम के सिद्धांत एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि कई स्तरों पर एक-दूसरे का पूरक हैं। यह पुस्तक आज भी भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श का एक अहम संदर्भ मानी जाती है।
राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर मौलाना आज़ाद की ये तीन कृतियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि शिक्षा सिर्फ पुस्तकों का ज्ञान नहीं, बल्कि सोचने, समझने और समाज को बेहतर बनाने की क्षमता विकसित करने की प्रक्रिया है—और इस दिशा में उनका योगदान सदैव प्रेरणा देता रहेगा।

