अमेरिकी वैज्ञानिक ने किया चौंकाने वाला खुलासा, 16 वर्ष में 19 हजार तैयार हुए वेरिएंट

आईआईएमटी न्यूज डेस्क, ग्रेटर नोएडा



कोरोनावायरस ने सम्पूर्ण दुनिया में त्राहिमाम मचाकर रख दिया। लोगों की जिंदगी में भूचाल लाने वाले संक्रमण ने लाशों के ढेर लगा दिए हैं। अन्तिम विदाई सम्मान से की जाती थी लेकिन इस भयंकर महामारी ने शवों को नदी नाले व खड्डों में लावारिश की तरह फेकने पर मजबूर कर दिया। अमेरिका के राष्ट्रपति बाईडन ने संक्रमण की उत्पत्ति पर जांच के निर्देश जारी किए थे जिसपर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सहमति जताई थी। बता दें कि चीन के वुहान टेक्नोलॉजी ऑफ रिसर्च लैब पर आरोप लगाते हुए 17 देशों ने जांच पर अपनी सहमति दी। एक अमेरिकी वैज्ञानिक का दावा है कि कोविड-19 की उत्पत्ति का पता नहीं लगाया गया तो कोविड-26 और कोविड-32 से बचना असंभव हो जाएगा। उनका कहना है कि अगर यह स्पष्ट नहीं होता है तो पूरी दुनिया 2026 और 2032 में एक बार फिर महामारी की चपेट में होगी।
इस संक्रमण की तैयारी 16 वर्ष से चल रही थी। कोरोना की उत्पत्ति जाननी है तो सबसे पहले हमें कैलेंडर के पन्ने पलटने होंगे और शुरुआत 30 दिसंबर, 2019 से करनी होगी, जब दुनिया पहली बार कोरोना के नाम से रूबरू हुई। दरअसल, उस दिन चीन में कोरोना का पहला मरीज सामने आया था। इसके बाद यह महामारी पूरी दुनिया में फैलती चली गई। वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में सेंटर फॉर इमर्जिंग इंफेक्शियस डिजीज की निदेशक शी झेंगली इसका खुलासा करती हैं। उनके द्वारा बताया गया कि 30 दिसंबर, 2019 को शाम 7 बजे का वक्त था जब उन्हें सार्स सीओवी-2 के बारे में पहली सूचना मिली, जिसे अब दुनिया भर में फैले कोविड-19 के सोर्स वायरस के रूप में जाना जाता है। झेंगली ने बताया कि एक वर्ष पहले एक कॉल के जरिए जानकारी मिली जिसमें वुहान लैब में कुछ असामान्य निमोनिया के मरीज मिले थे। उसी दौरान उन्हें शोध की सूचना भी दी गई। अभी तक की जानकारी में जानवर से मनुष्य के शरीर में संक्रमण दौड़ने का पता लगा है। झेंगली ने 16 वर्ष के दौरान 19000 नमूने एकत्रित किए हैं। यह कहा जा रहा है कि कोरोना 'लैब-मेड' वायरस नहीं था, लेकिन निश्चित रूप से उन वायरसों में से एक हो सकता है, जिनका वहां अध्ययन किया जा रहा था। इस मामले में शी झेंगली पर कोरोना फैलाने का आरोप लगाया गया है, लेकिन वह खुद को क्लीन चिट दे चुकी हैं। चीन के वुहान में कोरोना फैलने के कुछ ही महीनों बाद इसका प्रकोप पूरी दुनिया में नजर आने लगा। ऐसे में शी झेंगली की टीम ने दो सप्ताह तक इस वायरस पर शोध किया। उन्होंने वायरस के जीनोम में हुए बदलाव की जानकारी डब्ल्यूएचओ के साथ साझा की। इसकी असलियत की जानकारी मिली तब तक 80 लोगों इसके शिकार बन चुके थे। झेंगली और उनकी टीम के शोध में दावा किया गया कि यह वायरस प्राकृतिक तरीके से फैला।
फरवरी 2020 में प्रकाशित एक लेख में दावा किया गया कि नया वायरस पुराने सार्स से 79.6 फीसदी मिलता-जुलता है, लेकिन इसमें चमगादड़ में मिलने वाले कोरोनावायरस 96 फीसदी से अधिक हैं। हालांकि, बाद में यह दावा भी किया गया कि वुहान के सी-फूड मार्केट से यह महामारी फैली। अप्रैल 2012 के दौरान चीन में 6 नाबालिग रहस्यमयी निमोनिया की चपेट में आ गए। इसका असर बच्चों के रेस्पिरेटरी सिस्टम पर हुआ और तीन की मौत हो गई। ये लोग एक बंद पड़ी कॉपर की खदान में काम करते वक्त चमगादड़ों की चपेट में आ गए थे। उसी साल शी झेंगली और उनकी टीम को 4 सीरो सैंपल मिले, जिनमें तीन मरीज बच गए, लेकिन एक की मौत हो गई। उन्होंने इसका मिलान इबोला, निपाह और सार्स से किया, लेकिन रिपोर्ट निगेटिव आई। उसके बाद 2015 तक झेंगली और उनकी टीम ने उन गुफाओं से 1322 सैंपल जुटाए, जिनमें 293 सैंपल अलग-अलग तरीकों के कोरोनावायरस के मिले। इनमें 8 सैंपल बीटा कोरोनावायरस के थे, जबकि 8 में से एक आरएटीजी13 वायरस था, जिसकी पहचान 2016 में हुई। इसे आरएबीटीसीओ4991 नाम दिया गया। यह वायरस पुराने सार्स वायरस से एकदम अलग था, जिसे वायरस का नया स्ट्रेन कहा गया। दो साल बाद यानी 2020 में जब इसका मिलान एसएआरएस-कोविड-12 से किया गया तो 96.2 फीसदी समानता मिली। झेंगली का दावा है कि पिछले शोध में मिले वेरिएंट का अभी के वायरस से कोई मिलान नहीं है। इसका मतलब यह था कि मजदूरों कोरोना से संक्रमित नहीं हुए थे। यह निष्कर्ष लैब से कोरोना फैलने की अवधारणा सामने आने के कुछ महीने बाद दिया गया। उनका कहना था कि वे मजदूर एक जलाशय में फैले फंगल निमोनिया के संपर्क में आए थे।