हऊआ यानि करोना

डॉ वेद व्यथित
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ब्रज भाषा के एक लोकगीत की पंक्तियाँ खूब याद आ रही है जिस में माता यशोदा भगवान बालकृष्ण को कह रही हैं कि 'दूर खेलन मत जाओ लाल बन आये हैं हाउ। 'परन्तु उस समय तो हर तरफ वन ही वन यानि जंगल ही जंगल अर्थात पेड़ ही पेड़ होते थे और इस कारण वहां जाने से लोग डरते थे क्योंकि लोग मानते थे कि वहां पर हऊआ रहता है जो पकड़ कर ले जाता है। परन्तु अब न तो वन यानि जंगल ही रहे और न ही वृक्ष ही रह गए हैं परन्तु हऊआ जैसी चीज अभी भी करोना के रूप में आज भी मौजूद है। अब जब वन ही नहीं रहे तो यह हऊआ रहने के लिए भला कहाँ जाता। इस लिए यह अब आसानी से हमारे घरों के आस पास गावों में शहरों में सब जगह पहुँच गया है। और सब को इस ने बुरी तरह डरा रखा है। और इस हउआ का डर अब अच्छे-अच्छों को भी लग रहा है। डरे भी क्यों न जो भी इसकी पकड़ में आता है वह उस को छोड़ता नहीं है खा जाता है और पता नहीं वह खाता है या नहीं परन्तु डर के मारे लोग अपने आप ही घरों के अंदर घुस गए हैं। हरेक इस से डर कर छुपा हुआ है क्योंकि इस हऊआ का डर ही इतना गहरा बैठ गया है या बैठा दिया है कि यदि किसी तरह इस ने पकड़ लिया तो हम आप को इस से नहीं छुड़ा पाएंगे फिर आप का भगवान ही मालिक है क्योंकि यह हमारे काबू से बाहर है। इस से लड़ने के लिए हमारे पास न तो हथियार है और न ही गोला बारूद हैं और न ही बंदूक या तोप है और न ही इस की कोई दवा ही हमारे पास है जिस से हम इसे काबू में कर ले। इस लिए भाई इस हऊआ से आप अपना बचाव खुद ही करो। इस लिए लोग इस से भयंकर रूप से डर गए हैं।
चलो ये तो वे बातेँ हुईं जो टेलीविजन या समाचार पत्रों में आ रही हैं कि सब इस से सावधान रहो परन्तु बताने से या समझने से कौन किसी की सुनता है और लोगों की तो आदत ही है उलटा चलने कि उन्हें कहो ये मत करो तो उसे जरूर करते हैं उन्हें कहो बाहर मत जाओ तो वे जरूर जाते हैं और वे बाहर जाये बिना भला कैसे रह सकते हैं उन्हें यदि पता चले कि पिछली गली में हऊआ आया है तो वे देखने जरूर चले जायेंगे बेशक दूसरे के पीछे छुप कर ही देखें और भागने के समय दूसरे को बेशक उन्हें धक्का देना पड़े तो वे दे ही देते हैं परन्तु जायेंगे जरूर ही क्योंकि यह उन की खानदानी आदत है।
चलो ये तो मुंह जबानी बातें हुईं कि आप इस हऊआ से बहुत डर कर रहो। परन्तु जब टेलीविजन पर करोना से लड़ने वाले या जिन्हे अब करोना योद्धा कहा जाता है उन्हें देख कर तो लोगों को और भी डर लगने लगा है क्योंकि उन के कपड़े ही देख कर ऐसा लगता है कि शायद ये तो किसी दूसरे ग्रह से आये प्राणी लगते हैं। परन्तु वे भी इस करोना के हउआ से इतने डेरे हुए हैं कि उन्हें कहीं से भी पकड़ सकता है। कि शरीर का कोई भी हिस्सा यदि इसे खुला मिल गया या बाल भी बाहर रह गया तो बस यह वहीं से पकड़ लेगा और छोड़ेगा नहीं और बस फिर क्या है। इसी लिए वह अपने आप को पूरी तरह ढक कर रखते हैं जैसे हम बचपन में जब गर्मियों में रात को छत पर सोते थे तो रात को जब हमे डर लगता था तो हम चादर से अपने आप को पूरी तरह ढक लेते थे कि बस अब भूत कहीं से भी हमे नहीं पकड़ पायेगा पर हम क्योंकि छोटे थे और अनसमझ भी होते थे और भूल जाते थे कि जब डर या हउआ आएगा तो क्या वह हमारी चादर नहीं हटा सकेगा। क्या उस से चादर भी नहीं हटेगी ऐसे ही आप बेशक अंतरिक्ष यात्रियों के जैसे कपड़े भले ही पहन लो परन्तु फिर भी इस बचना कठिन होता है। वह किसी भी सुराख से कहीं से घुस ही जाता है और जहाँ भी उस का दाव लगा वह तुरंत घुस गया और आप के अंतरिक्ष के कपड़े धरे के धरे ही रह गए। इसी लिये लोगों में जबरदस्त डर बैठ गया कि यह हऊआ तो किसी ने किसी तरह पकड़ ही लेता है।
इस लिए इस से सब प्रकार से डर कर रहो । घरों में कैद हो जाओ क्योंकि पता नहीं किस रूप में और किस भेष में नारायण तो नहीं मिलेंगे कलियुग में, वे तो ऐसे में कैसे आएंगे क्योंकि उन के आने लायक तो अब यहां वातावरण ही नहीं रहा क्योंकि न ही जमुना साफ़ रही और न ही वन उपवन ही रहे और न ही बांसुरी ही रही, नहीं सीधे सादे बाल गोपाल ही रहे क्योंकि अब उन के हाथ में एक ऐसी चीज है जिस में वे सब कुछ देख लेते हैं जिन्हें उन के माँ बाप चुप- चाप अकेले में देखने की कोशिश करते हैं और लोग भी तो आज बहुत चालाक हो गए हैं और सखियाँ तो अब फ्रेंड बन गयीं हैं जिन का एक भगवान से ही प्रेम नहीं है वे तो अब एक नहीं अनेकों की फ्रेंड हैं। इस लिए ऐसे में भगवान जी की भला यहां आने की हिम्मत कैसे हो सकतीं हैं।
परन्तु भगवान जी न आये यह तो हउआ के लिए और भी अच्छा है क्यों कि हमारे मियाँ घर नहीं हमे किसी का डर नहीं तो बस भगवान की जगह आ गया हउआ .जिस ने लोगों की डरा डरा कर ऐसी की तैसी करनी शुरू कर दी। इस लिए लोगों ने अपने घर के सदस्यों से भी दूरी बना ली कि पता नहीं हऊआ कब किस भेष में मिल जाये या किस पर सवार हो कर आ जाए। इसलिए लोगों को अपने परिजनों यानि परिवार वालों पर भी विश्वास नहीं रहा कि क्या पता श्री मतीजी किस दिन का बदला उतार लें कि उन्हें तुम ने बहुत तंग किया है बहुत दिनों से न तो कहीं घूमाने ले गए थे न ही मन पसंद कपडे दिलवाएं थे और उस के पीहर यानि मायके भेजने को तो कभी राजी ही नहीं होते थे और हमेशा ही अपनी माँ की साइड यानि तरफदारी ही करते रहते हो। इस लिए उन्होनें अपनी पत्नी से भी जितना हो सकता था दूरी बना ली। पत्नी ही नहीं बूढ़े माँ बाप को भी अलग कमरे में रखना पड़ा ।
इस हऊआ के डर की इंतहा तो तब हो गई जब शादी में भी डंडे चल गए और हाथों की बजाय डंडों का प्रयोग शुरू हो गया दूल्हा दुल्हन ने एक दुसरे को डंडों के द्वारा माला पहनानी शुरू कर दीं हद हो गई इस हऊआ की भी। भाई हऊआ का इतना ही डर था तो शादी क्यों कर रहे हो क्या दुल्हन को शादी कर के घर नहीं ले लाओगे क्या उस से शादी के बाद में जो करना होता है वह नहीं करोगे और यदि ऐसा ही था तो शादी बाद में कर लेते कौन सा वह भागी जा रही थी या तुम बूढ़े हो रहे थे कि बस इस के बाद शादी होगी ही नहीं या शादी के महूर्त ही खत्म हो जायेंगे और फिर शादी ही नहीं होगी या वह ससुराल में आ कर कुछ भी नहीं छुएगी और कुछ भी नहीं तो उसे अपनी सास के पैर तो छूने ही पड़ेंगे और यदि उस ने ऐसा नहीं किया तो बस फिर तो आप को भी पता है कि घर में क्या होगा। घर ही नहीं पूरे मोहल्ले में भी यह खबर आग की तरह फ़ैल जाएगी कि बड़ी बेशर्म बहू आई है अरी देखियो सास के भी पैर नहीं छुए। ऐसी कितनी पढ़ी लिखी आ गई और पढ़ लिख कर क्या बड़ों की इज्जत नहीं करते हैं। तब आप के लिए जबाब देना मुश्किल हो जायेगा।
परन्तु चलो मुझे शादी से तो कोई आपत्ति नहीं है बेचारी किसी कन्या के हाथ तो पीली हो ही गए क्योंकि बेटियां तो सब की एक जैसी ही होती हैं बेशक डंडों से सही माला तो पहन और पहना ही ली। शादी तो हो ही गई। क्योंकि हम और हमरा धर्म तो बड़ा ही प्रगतिशील है क्योंकि जितनी देर में कहो उतनी देर के फेरे भी पड़वाए जा सकते हैं दस मिनट से ले कर दस घंटों यानि पूरी पूरी रात में भी विवाह पूरा हो जाये तो गनीमत, पर शादी हो जाए ख़ुशी की बात यह है बेशक लड्डू खाने को मिले या न मिले पर सुन कर तो बहुत अच्छा लगता ही है यानि मन में तो लड्डू फूटते ही हैं। चलो शादी की बात छोडो यहां तो लोगों ने अपने रिश्तेदारों से भी दूरी बना ली कि वे उन्हें जानकर भी नहीं जानने का नाटक करने लगे की उन्हें कभी जानते भी थे या नहीं। कइयों ने तो अपने दोस्तों को फोन कर कर के बता दिया है कि इस समय न तो वे किसी के घर जा रहे हैं और न ही किसी को अपने घर पर बुला रहे हैं, यानि इस का सीधा मतलब यह हुआ कि न तो हम आप के घर आएंगे और न ही आप हमारे घर आना क्योंकि आप ने हमारे यहां आने की सोची तो बाहर बहुत खतरा है तो फिर से सोच लो हऊआ आप का इन्तजार कर रहा है और स्पष्ट कर दिया कि आप तो आना ही मत और हमे आने के लिए भी मत कहना ताकि आप भी हमारे घर ने आ सको।
इस हऊआ का डर हमारे समाज में इतना गहरे बैठ गया कि सरकार ने भी यह तय कर दिया कि भाई अंतिम संस्कार में सोच समझ कर ही जाना वहां भी आप को हऊआ पकड़ सकता है। और वैसे भी आप किसी के मरने पर कौन सा दुखी ही होते हैं। दुःख तो मरने वाले के घर वाले ही झेलते हैं बाकी तो बस वैसी ही चले जाते हैं कि जब सब जा रहे हैं तो उन्हें भी चलना चाहिए नहीं तो लोग क्या कहेंगे चलो हम भी चलते हैं परन्तु दुःख के कारण थोड़ी जाते हो और मरने वाले के घरवालों की कौन सी मदद ही करते हो और वैसे भी आजकल बड़ी-बड़ी शोक सभाओं का चलन चल पड़ा है। इन शोक सभाओं में मरने वाले को बिना जाने पहचाने भी पहुँच जाते हैं क्योंकि उन्हें हर किसी को श्रद्धांजलि देनी होती है बेशक उस के घर वाले भी आप को जाने या न जाने और ऐसे लोग देर से आकर भी सब से आगे घुस कर बैठते हैं ताकि उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए कोई भूल न जाये और लगे हाथ वे अपने आने वाले चुनाव का प्रचार भी कर ही जाते हैं कि देखो मैं तो आप के हर दुःख सुख में शामिल रहता हूँ आप के साथ खड़ा रहता हूँ और कुछ को तो इन शोक सभाओं में अपना भाषण देने और अपना ज्ञान बघारने का शौक ही पूरा करने आते हैं परन्तु अब इस हऊआ के डर के मरे किसी की हिम्मत नहीं हो रही है।
चलो गरीब गुरबा तो इस हऊआ से बेचारे जैसे तैसे काम चला लेंगे कि हऊआ तो शहरों में हैं हम सड़कों पर चले जायेंगे वहीं सो लेंगे वहीं खा लेंगे मिल जायेगा तो अपना बोझ खुद ही ढो लेंगे परन्तु इस समय यदि चुनाव का होता तो वे सफेद कुर्ते वाले हमारे पैर तक छूने से नहीं मानते। परन्तु अब तो वे भी नजर नहीं आते और उन्होंने तो अपने दफ्तरों में या घरों में हऊआ के डर मारे सारे साधन अपना लिए हैं कि कहीं हऊआ इन्हे न पकड़ ले इस लिए वे न तो अब उद्घाटन करने जा रहे हैं और न ही भाषण देने जा रहे हैं और न ही सभा कर रहे हैं क्योंकि उन्हें भी हऊआ का डर ही ऐसा है।
हो सकता है यह डर शायद ठीक भी हो क्योंकि मरने से सब को डर लगता है कोई भी ऐसा नहीं नहीं जो मौत से न डरता है। इस लिए भाई हऊआ से डर के रहना ही चाहिए क्योंकि यह दिखाई तो देता नहीं है अपितु यह चुपचाप जैसे ही इस का दाव लगता है यह किसी को भी पकड़ लेता है और ले जाता है अपने साथ अस्पताल में कि वहां बहुत खुला घूम रहा था बेटा सड़क पर अकड़ अकड़ कर, अब देखता हूँ कि तू कितना निडर है बेटा अब पड़ा रह अस्पताल में और घरवाले भी नहीं पूछने आएंगे । इस लिए हऊआ से डरने में ही फायदा है परन्तु फिर भी इस से लड़ना तो पड़ेगा ही। इसलिए अपना बचाव करते हए इस को भगाना ही है।


(लेखक हरियाणा ग्रन्थ अकादमी के सदस्य हैं)