मुच्छिका यानि मास्क

आईआईएमटी न्यूज डेस्क, ग्रेटर नोएडा



डॉ वेद व्यथित
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करोना महामारी जब शुरू हुई तो धीरे-धीरे यह पूरी दुनिया में ही फ़ैल गई। पहले तो धीरे-धीरे फैली और फिर तो इस ने एक्सप्रेस रेल गाड़ी जैसी स्पीड पकड़ ली और जिधर देखो उधर ही लोगों ने इस के डर के मारे अपने-अपने मुंह नाक सब मास्क से ढक लिए। इतना ही नहीं दोस्त यारों की तो छोड़ो प्रेमियों ने अपनी अपनी प्रेमिकाओं और जिन दूसरे की प्रेमिकाओं से छुप कर मिलते थे और गाल पर किस करने की फ़िराक में रहते थे उन्होंने ऐसा करना तो दूर हाथ तक मिलाना भी बंद कर दिया। कहाँ तो गाल चूमे बिना उन्हें चैन नहीं था परन्तु अब दो गज की दूरी से ही हेलो- हाय करने लगे और कई तो ऐसे थे जिन्हे चौराहे पर जा कर बिना बात की बकवास किए बिना चैन ही नहीं मिलता था तो ऐसे लोगों का तो जीना ही दूभर हो गया। कुछ ऐसे भी थे जिन्हे दूसरों के घर में कैसे चाय का जुगाड़ किए बिना रोटी ही हजम नहीं होती थी पर अब घर में कैसे अपनी चाय पिए यह उन के लिए एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई। एक तो अपने घर की दूध चीनी चाय पत्ती खर्च करने में उन का दम निकलता है और दूसरे उन की श्रीमती जी कौन सा उन के कहने से चाय दे ही देंगी। उन्हें यह भी अच्छी तरह से पता है।
कहने का मतलब यह है कि लोग घरों में रह कर बहुत परेशान हो गए। न कहीं जाना न किसी का आना और वैसे भी उन्हें अपने घर किसी को बुलाना तो था ही नहीं पर वे तो किसी के भी घर जा धमकते परन्तु यह सब भी बंद हो गया और दूसरे मुंह पर मास्क लगाना भी हर समय जरूरी हो गया। भाई भरोसे लाल गाँव से शहर में आ कर बसे थे तो उन्हें याद है कि वे तो गाँव में पशुओं के मुँहपर मुच्छिका बांधते थे पर यहां तो हरेक आदमी और औरत तथा बच्चों तक के मुंह पर मुच्छिका बांधना पड़ रहा है। भाई भरोसे लाल वैसे भी राष्ट्र भाषा कॉपरटी समर्पित व्यक्तित्व हैं तो उन्होंने यह भी खोज लिया कि जरूर इस पशुओं के मुंह पर बांधने वाले मुच्छिका शब्द से ही मास्क शब्द की उत्पत्ति हुई है। हो सकता है जब अंग्रेज भारत में थे तो उन्होंने यहां पशुओं के मुंह पर बांधने वाले मुच्छिका को समझने के लिए अपने साथ ले गए होंगे और फिर उन्होंने इस पर रिसर्च यानि शोध कर के इस मुच्छिका का नाम ही मास्क रख लिया होगा। इसका नाम मास्क इस लिए भी रखा हो कि उन से मुचिका बोला भी नहीं जा सकता है। इस लिए उन्होंने इसे मास्क कहना शुरू कर दिया। वास्तव में भारत ने तो पहले से ही विज्ञान में लठ्ठ गाड़े हुए हैं। परन्तु यह बात तो लोगों को अब समझ आई जब सब ने ही मुच्छिका यानि मास्क बांधना शुरू कर दिया है।
क्योंकि यहां पर तो लोग अपने कंधे पर साफी,अंगोछा, गमछा तौलिया पर आज के जैसा नहीं और यदि अच्छी भाषा में कहूँ तो जिसे संस्कृत में उत्तरीय कहते हैं उसे कंधे पर रखे रहते थे। वे चाहे घर पर रहें या कहीं पर जाएँ तो उन के कंधे साथ यानि उन के कंधे पर यह गमछा या
अंगोछा रखते थे। वे चाहे घर पर रहे या बाहर जाएँ तो उन के साथ यानि उन के कंधे पर यह गमछा जरूर रहता था। इस के बिना उन्हें कहीं जाना अच्छा नहीं लगता था या अधूरा सा लगता था जैसे कुछ समय पूर्व विदेशों में या अब भारत में रुमाल रखना जरूरी है वैसे ही लोग यहां गमछा या अंगोछा रखते थे। यह अंगोछा लोगों के कई काम आता था। आधुनिक मास्क तो केवल मुंह और नाक को ही ढक सकता है परन्तु गमछा तो उन्हें हर प्रकार से ढक सकता था। उसे लपेट कर आसानी से कहीं भी स्नान कर सकते थे क्योंकि पहले खुले में ही आदमियों के नहाने की व्यवस्था होती थी और रात को यदि मच्छर काटने लगें तो वे उसे ओढ़ भी लेते थे और कहीं भी बिछा कर बैठ और लेट जाते थे और उन दिनों गांव में तकिया भी नहीं होते थे तो यह तकिया की जगह सिरहाने लगा कर सोने के काम भी आता था और भयंकर गर्मियों में सर पर ढक लेते थे जो हैट से भी ज्यादा अच्छा रहता था और गर्मियों में लू लगने से भी बचा लेता था और सर्दियों में भी इसे सर पर बांध कर सर्दी से बच जाते थे और यदि बाजार से कुछ लाना होता था तो यह गमछा उस समय भी काम आता था और आज की पर्यावरण के हानिकारक पोलोथिन से भी बचाव होता रहता था और भी बहुत से फायदे थे जो आप को मुझसे भी अधिक पता होंगे परन्तु मुझे से ओल्ड में यानि बुजुर्ग लोगों को खूब पता होंगे मैं आजकल की नई पीढ़ी की बात नहीं कर रहा हूँ।
इसी लिए शायद बड़े साहब ने भी गमछा या अंगोछा के इतने सारे गुणों को जानते हुए और इस के इतने सारे उपयोगों को देखते हए अपने कार्यकर्ताओं को मास्क की जगह गमछा रखने का संदेश इस लिए भी दिया कि इस गुणों के साथ आप की अलग पहचान भी बनी रहेगी और पैसा भी बचेगा कि बाजार से मास्क खरीदने के बजाय गमछा ज्यादा बढ़िया रहेगा। यह बात अलग है कि उन के कार्यकर्ता तो पहले से ही अपनी तरह का अलग रंग का गमछा रखते हैं और दूसरी पार्टी के कार्यकर्ता इस रंग का गमछा इस लिए नहीं रखते कि यह तो उन की दुश्मन पार्टी के लोग रखते हैं। इस लिए उनके गमछे अलग रंग के होते हैं और अन्य पार्टियों ने भी अपने अपने रंग को चुन कर उन के गमछे अपने कार्यकर्ताओं को रखने का इशारा किया हुआ है। और दूसरे रंग के गमछे को देख कर अनाप शनाप कुछ भी बक दो परन्तु उन्हें भी बेशक पता है कि यह रंग प्राचीन भारतीय रंग है परन्तु वे तो इस के बहाने बेशक भारत और भारत माता को भी गाली देने से नहीं चूकते हैं। और देश के बहुत सरे लोगों की पार्टियों का तो थी एजेंडा रहता है।
परन्तु बात तो उस रंग के गमछे और आकार प्रकार की है जो यहां से हजारों मील दूर का है। हो सकता यही वहां की परिस्थिति ऐसी हों, पर भारत में तो ऐसा नहीं है, पर कुछ लोग जान बूझ कर जिद्द कर के इस लिए उसे पहनते हैं कि देखो हम भारत से अलग हैं या हमारी आस्था भारत में नहीं है कहीं और है। इसी कारण वे बाहरी गुलामी को बिना बात ओढ़े फिरते हैं। और कुछ तो राजनीतिक पार्टियां भी चाहती हैं वे भारतीय नहीं उसी विदेशी पोशाक में उन के साथ मंच पर खड़े रहें ताकि लोग उन की पार्टी को इन का हमदर्द समझ कर उन की पार्टी को ही वोट दे दें। परन्तु वे भी कम नहीं होते वे भी इस पोशाक प्रदर्शन की पूरी रकम और अन्य सुविधाएं उन से आसानी से वसूल लेते हैं। परन्तु बेशक वे कुछ भी करें पर यहां के पूर्वज उन के भी तो पूर्वज थे इस बात से वे कैसे मना कर सकते हैं। तो कम से कम अपने उन पूर्वजों की तो इज्जत करें और दूसरों के बहकावे में आ कर किसी की जै तो न लें।
परन्तु चलो भगवान उन्हें सही अक्ल दें जिस से सब का जीवन सुखी हो परन्तु बात तो मास्क की चल रही थी और यह गुलाब से गुलकंद तक चली गई परन्तु इस गमछे के अन्य भी कई प्रकार हैं और कुछ प्रकारों और तरीकों पर तो बस नेताओं का ही अधिकार होता है वे (गम्छेकपरटोगीस) प्रकार नहीं करते हैं जैसे आम आदमी करता है क्योंकि वे तो आम आदमी या आम जनता तो हैं नहीं फिर वे इस का प्रयोग भी भला आम जनता की भांति क्यों करें। वे तो अपने आप को आमजनता से अलग मानते ही हैं और खुद ही अपने आप को भगवान माने रहते हैं। इसी लिए वे गमछे को वैजयन्ती माला भी मान कर ऐसे डाले रहते हैं कि जरा सा भी हिल जाये तो एकदम उन का हाथ उसी पर जाता है और वे न तो उस से हाथ पौंछते हैं और न ही उसे सर पर बांधते हैं और न ही उस का सिवाय गले में डाले रखने के अन्य कुछ भी उपयोग नहीं करते हैं और शायद इसे वैजयन्ती माला मान कर सामान्य कार्यकर्ताओं से भेंट में भी गले में डलवाते हैं। और आपस में भी डालते रहते हैं कि तुम मुझे वैजयन्ती माला पहनाओ मैं तुम्हे पहना दूंगा। धन्य हैं ये महान लोग इन की जय हो।
परन्तु चलो छोडो इन बातों को बात तो मास्क की और बीमारी से लड़ने की चल रही है। यह तो बीच में स्टेज पर पर्दा उठने तक का ड्रामा था तो मास्क के बाद इस महामारी से लड़ने के लिए जो दूसरी बड़ी बात है वह है बार-बार हाथ धोने की। तो हो सकता है यह बात भी भारत से ही विदेशों में फैली हो क्योंकि यहां तो बात-बात पर हाथ धोने का चलन है। हर काम करने से पहले यहां हाथ धोने की प्रथा पहले से ही है और हाथ ही नहीं यहां तो हाथ के साथ मुंह और सर पर भी गीला हाथ फैरने की प्रथा है। इसी लिए यहाँ खाना खाने से पहले हाथ धोना जरूरी है और स्वय के हाथ धोना ही नहीं यहां तो दूसरों को बिना हाथ धोये खाना भी नहीं मिलता है। जैसे कि पहले दावत में बैठने से पहले पंडाल के बाहर ही एक आदमी बाल्टी में पानी और लोटा के कर खड़ा होता था और वह सब के हाथ धुलवाता रहता था। इस कारण कोई भी बिना हाथ धोये अंदर दावत में जा ही नहीं सकता था। और इतना ही नहीं घर में भी यदि कोई कार्यक्रम हो तो केवल हाथ धोने तक ही नहीं बल्कि नहा धो आकर उस में सम्मलित होना पड़ता है भला आप ने कभी अपने घर में देखा हो की कोई बिना नहाये ही पूजा में बैठ गया हो। और उस के बाद भी पूजा करवाने वाले पंडित जी फिर से उस पानी के छींटे मार कर पवित्र करने की यानि सेनेटाइजेशन प्रक्रिया करते हैं। और यहां तो मौत पर भी दुःख प्रकट जाने पर भी नहाने धोने की प्रथा है और शोक प्रकट करने जाने की प्रथा को भी कुल्ला करना ही कहा जाता है यानि वहां से आने पर आप अपना हाथमुँह साफ़ कर के घर आये।
परन्तु ख़ुशी तो इस बात की है की महामारी करोना के कारण ही सही भारत की पुरानी अच्छी-अच्छी बातें फिर से वापिस लौट कर आ रहीं हैं जिन के कारण हम अवश्य ही महामारी से छुटकारा पा ही लेंगे।

(लेखक हरियाणा ग्रन्थ अकादमी के सदस्य हैं)