करोना के योद्धा व योद्धा

आईआईएमटी न्यूज डेस्क, ग्रेटर नोएडा





डॉ वेद व्यथित
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करोनामहामारी क्या आई , यहाँ हर आदमी योद्धा बन गया। जिस किसी को देखो वही योद्धा कहलवाने लगा परन्तु इस में उस का क्या कसूर , उस ने तो नहीं कहा कि मुझे योद्धा कहो न ही उस की ऐसी कोई मंशा या इच्छा भी नहीं थी पर वह क्या करता जब सरकार ने ही उसे योद्धा घोषित कर दिया तो फिर इस में उस का क्या कसूर कि कोई यदि ताऊ को ताऊ जी कहने लगे तो इस में ताऊ क्यों बुरा मानने लगा। .भला जी लगाना तो भारत की पहचान है पर हरेक आदमी को ताऊ बना दोगे तो बाकियों का क्या होगा या सब तो ताऊ जी नहीं बन सकते हैं। केवल ताऊ ही तो ताऊ जी रहेगा। ऐसे ही करोना महामारी में तो सरकार ने सब को ही योद्धा बना दिया। परन्तु ऐसे सब को योद्धा बनाने से तो फिर जो असली योद्धा हैं उन्हें योद्धा कौन कहेगा। फिर तो योद्धा भी इन नकली योद्धाओं की श्रेणी में आ जायेंगे। अर्थात जो योद्धा है तो इन नए योद्धाओं के कारण जो असली योद्धा है वे तो फिर योद्धा नहीं रहेंगे। अब यदि असली योद्धा ही योद्धा न रहेंगे तो युद्ध कैसे होगा। यदि बाकि लोग जिन्हे आप योद्धा कह रहे हैं या बना रहे हैं उन्हें तो जिंदगी में दो चार महीने ही तो कभी कभार काम करना पड़ भी गया तो इस का यह मतलब तो नहीं हुआ कि आप योद्धाओं को ही भूल कर किसी को भी योद्धा कहने लगें । परन्तु जो योद्धा अपनी पूरी सर्विस घर से बहुत दूर कंटीली झाड़ियों में ,सांप बिच्छुओं के बीच चिलचिलाती धूप, भयंकर बरसात और जीरो डिग्री से नीचे चालीस पैतालीस डिग्री में भी खड़े रहते हैं और जिन के सामने हमेशा दुश्मन रहता है और बंदूक और तोप हमेशा जिन की तरफ तनी रहती है और यदि चल जाये तो सीधे सीने में से पार निकलतीं हैं। और जब गोली सीधे सीने में लग जाती है। उस के बाद बेशक आप उन्हें वीर सपूत बलिदानी वीर हीरो ,भारत माता के लाल कुछ भी कह लो, परन्तु गए हुए प्राण कभी वापिस नहीं आते हैं फिर उन के शव तिरंगे में लिपट कर आते हैं और फिर उन के घर वालों को भी तुम रोने तक नहीं देते हो क्योंकि तुम उन्हें रोते हुए दिखाते ही नहीं हो कि कहीं तुम्हारी पोल न खुल जाये .इस के बाद भी वे यदि योद्धा नहीं रहेंगे और जब तुम हर एरे गैरे को योद्धा बना दोगे तो इन असली योद्धाओं पर क्या बीतेगी।
तो क्या आप भी भारत के पहले साहब की ही तरह इन्हे योद्धा नहीं रहने देना चाहते हो जैसे उन्होंने असली योद्धाओं को छोड़ कर बाकियों को योद्धा बना दिया था। जो दो दिन भी उन परिस्थितियों में लोहा नहीं ले पाए थे। यदि ऐसे ऐसे योद्धा बना दिए जायेंगे तो फिर देश के योद्धाओं को कौन योद्धा मानेगा या कहेगा। वैसे आप ने कोई कसर बाकि तो छोड़ी नहीं है। आप के नकली योद्धाओं पर तो आप के कहने से सब फूल बरसा ही रहे थे और यदि आप जनता को कुछ और भी कहते तो वह थाली ताली और दिए जलाने की ही भांति आसानी से वह सब भी कर लेती परन्तु आप ने तो योद्धाओं को ही लोक सम्पर्क विभाग का काम सौंप दिया यानि जो काम सरकारी लोक सम्पर्क विभाग की भजन या रागनी गायकों की मंडली करती हैं वह हीं योद्धाओं से आप ने करवाना शुरू कर दिया उन से आप फूल बरसवाने लगे उन से ही आप बैंड भी बजवाने लगे। मुझे तो यह समझ नहीं आया कि आखिर इन के बैंड से आप ने कौन सी धुन बजवाई, क्योंकि इन के बैंड की धुन तो आगे बढ़ने के लिए ही प्रेरित करती है और कदम कदम बढ़ाये जा ,ऐसी धुन बजती है।
हो सकता है इन के बैंड की ऐसी २ धुन सुन कर ही कदम आगे बढ़ा कर ठेके खुलवा दिए हो और बस फिर क्या था बैंड की धुन तो बज ही चुकी थी। इस लिए लोग भी कदम कदम बढ़ते हए फटाफट ठेकों पर पहुँच गए। ठेकों पर पहुंचे क्या उन्होंने ठेकों पर चढ़ाई ही कर दी क्योंकि ये भी तो योद्धाओं के लिये ताली बजा बजा कर स्वयं ही योद्धा बन गए हो। इस लिए पिल पड़े ठेकों की ओर और फिर तो क्या करोना ,क्या महामारी क्या सोशल डिस्टेंसिंग क्या मास्क क्या नियम सब कुछ भूल कर कदम कदम बढ़ाते हए हुजूम के हुजूम ठेकों पर इकठ्ठा हो गए।
इन योद्धाओं को देख कर सरकारों की मुस्काने फिर से लौट आईं। क्या मेरे द्वारा इन्हे योद्धा कहने से कुछ दिक्क्त तो नहीं हुई ? पर मैं पूछता हूँ कि ये योद्धा कैसे नहीं हैं। ये भी तो युद्ध कर रहे हैं जान पर खेलकर यानि जान की परवाह किये बिना ही सुबह सुबह पांच बजे सही लाइन में जा लगे। आखिर इन योद्धाओं ने भी देश के प्रति अपना कर्तव्य समझा कि आखिर देश की अर्थ व्यवस्था ही तो किसी देश की रीड होती है और यदि यही टूट गई तो देश कैसे बचेगा देश भी टूट जायेगा परन्तु सच्चा योद्धा कभी देश को नहीं टूटने देता यही नहीं बेशक इस लिए उसे अपने प्राणो की भी बजी लगानी पड़े तो भी वह कभी पीछे नहीं हटता है। इस लिए उन्होंने जान पर खेल कर धूप गर्मी बरसात सह कर पुलिस के लठ्ठ खाकर भी देश की अर्थव्यवस्था को बचाये रखने के लिए ठेकों पर मख्खियों की भांति भिनभिनाने लगे ताकि देश की अर्थ व्यवस्था पटरी पर दौड़ती रहे। इस लिए ही तो इन्हे भी योद्धा कहा जा रहा है क्योंकि देश की अर्थ व्यवस्था इन्ही के कारण पटरी पर है।
बेशक इन के चक्कर में बाकी चीजें पटरी पर रहें या न रहें तो क्या हुआ पर पटरी पर कुछ तो रहना ही चाहिए क्योंकि खाली पटरियां अच्छी नहीं लगती हैं। इतनी भरी भरकम पटरियां और इतनी लम्बी- लम्बी पटरियां खाली रहें तो ठीक नहीं है परन्तु बेशक पटरियों पर रेल हों या न हों परन्तु कुछ योद्धा तो पटरियों पर हैं ही ,ये योद्धा सिर पर गृहस्थी का बोझ लादे ,उनकी घरवालियाँ बच्चों को गोद में उठाये और कुछ को घसीटते हए भूखे प्यासे लुटे- पिटे मजबूर पटरियों पर जरूर चल रहे हैं। अब क्योंकि जब पटरियों पर रेल ही नहीं हैं तो उन पटरियों का कुछ तो उपयोग होना ही चाहिए। रेल नहीं हैं तो क्या हुआ उन पर कुछ तो चाहिए। अब सोचिये जिन पटरियों पर इतनी भारी रेल चलती है जिस के चलने से आसपास की धरती ही नहीं इमारतें भी थरथराने लगतीं हैं और हर तरफ धूल उड़ने लगती है।
तो सोचो ऐसी पटरियों पर जो लोग अर्थात मजबूर लोग इन पटरियों पर चल रहें हैं तो वे भी तो योद्धा ही हैं क्योंकि इन पर चलना कोई आसान काम नहीं है। इन पर चलना सीधे मौत के मुंह में चलने जैसा होता है। क्योंकि नीचे लोहे की पटरियां और ऊपर बिजली के हाई वोल्टेज तार यदि ऊपर से तार गिरा तो वह मजबूर सीधा ऊपर और यदि भूख प्यास से चक्कर आ कर निचे गिरा और सिर लोहे की पटरी से टकरा गया तो सीधे धराशाही। इस लिए इन्हें भी मैं तो योद्धा ही कहता हूँ तो इस में मुझे आप गलत क्यों बता रहे हैं।
ऐसे ही और कई दूसरे योद्धा भी तो हैं जिन्हें सरकार की योद्धाओं की सूची याली लिस्ट में स्थान ही नहीं दिया गया है बेशक अख़बार वाले अपने बल पर योद्धाओं की सूची में स्थान पा गए हैं। परन्तु रोज सुबह उठ कर बरसात सर्दी या गर्मी की प्रवाह किये बिना जो योद्धा आपके घर आप की आँख खोलने से पहले आप के लिए दूध पहुंचाते हैं वे क्या योद्धा नहीं हैं। ऐसे ही आप को जो रोटी खाने के लिए सब्जी देने आते हैं वे क्या योद्धा नहीं हैं। जिन्हें आप मुफ्त का धनिया और हरी मिर्च न देने पर कुछ भी सुना देते हो क्या वह योद्धा नहीं हैं वे भी तो अपनी जान पर खेल कर आप का जीवन सुखी बना रहे हैं। पर सरकार ने पता नहीं क्यों इन्हें योद्धाओं की सूची में नहीं रखा है जबकि करोना से ठीक होने वाले भी योद्धा मन लिए गये हैं जिन पर सब लोग फूल बरसा कर स्वागत कर रहे हैं।
परन्तु कुछ और लोग भी अपने आप को योद्धा बनाने पर तुले हैं वे स्वयं ही योद्धा बन रहे हैं। इन में सब तो नहीं पर जो एक किलो आटे की थैली के साथ अपना फोटो खिंचवा कर फेसबुक पर लगा रहे हैं या थोड़ी सी आलू की सब्जी और तीन पूरियाँ दे कर महान बन रहे हैं और कई तो सरकारी खंजाने में बिना कुछ किये ही बड़े बड़े बिल दे रहें हैं ,वे मेरे लिए कतई भी योद्धा नहीं हैं। योद्धा तो छोडो मैं उन्हें योद्धा की पूंछ भी नहीं मानता हूँ। आप के लिए बेशक़ योद्धा हो पर मेरे लिए नहीं हैं। ऐसे ही कुछ और लोग हैं जो लोगों से पैसा ले कर उसे सीधे प्रधान मंत्री या मुख्यमंत्री के कोष में न जमा करवा कर इलाके के मंत्री को देने जाते हैं जब की पी एम और सी एम के खाते सार्वजनिक हैं वे सीधे चैक को उन के खातों में भी तो जमा करवा सकते हैं परन्तु पता नहीं क्यों ये इसे मंत्री के पास ही क्यों ले जाते हैं क्या मंत्री को इन्होंने डाकिया समझा हैं कि इसे जमा करवा देना। यह जमा तो प्रधान मंत्री या मुख्य मंत्री के कोष में ही होना है क्योंकि और कहीं इस का उपयोग हो नहीं सकता है। परन्तु बिना मंत्री के साथ फोटो खिंचवाए इन की बीमारी शान्त होने वाली नहीं होती है। क्योंकि मंत्री तक पहुँचने का इस से आपका रास्ता आसान हो जाता है और फिर आप समय पर चैक की जगह कुछ और भी मंत्री तक पहुंचाते रह सकते हैं और बिना फोटो खिंचवाये भी चुपचाप भी मिलकर आते रह सकते हैं। ऐसे कितने ही और योद्धा भी हमारे देश में हमेशा सक्रिय रहते हैं और जो योद्धा भी नहीं है उन्हें भी योद्धा बनाने में सक्रिय रहते हैं। परन्तु मेरी प्रार्थना तो सब से यही है कि जो भी जैसा भी है उसे वैसा ही रहने दें योद्धा को योद्धा रहने दें ताकि उस का सम्मान बना रहे। परन्तु हरेक को योद्धा बना देंगे तो फिर योद्धाओ को योद्धा कौन कहेगा पर हाँ आप सब को भारत माता का सपूत बनाने के लिए प्रयास अवश्य करें।


(लेखक हरियाणा ग्रन्थ अकादमी के सदस्य हैं)