हाउ इस दी जोश?

डॉ वेद व्यथित
(सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार)
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राजा की सवारी निकलने की घोषणा हो गई। लोगों में इतना जोश आ गया कि हाउ इज जोश पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ी। लोग बिना पूछे ही हाउ इज दी जोश बताने लगे। और जोश-जोश में नारेबाजी फूलों की वर्षा नाच गाना सब कुछ था। और इससे भी ज्यादा कुछ होगा। चलो ये तो संगी साथी थे क्योंकि जो लड्डू अब बंटने थे उसके लिए सब लालायित थे। इसलिए भरपूर जोश में थे। पर जिन्हे कुछ नहीं मिलना था, वे भी जोश में थे। पर ये सब तो शुरू से ही हाई जोश बनाये हए थे।
परंतु बात तो उनकी थी अपने घरों के सामने राजा की सवारी के लिए पानी नहीं छिड़कने दे रहे थे या अपने घर में सामने कुछ भी न लगने देने के लिए अड़े थे। लोगों ने उन्हें बहुत समझाया कि यही सवारी सिंहासन तक जाएगी। आप इसका स्वगत करो नहीं तो बाद में आप को पछताना पड़ेगा। पर उनके कान पर कोई अंधी कानी या लंगड़ी जूँ तक नहीं रेंगी और वे अपनी जिद्द पर अड़े रहे। आखिर राजा की सवारी निकलने का दिन भी निश्चित कर दिया गया।
परन्तु जब ढोल बजता है तो सबके पाँव थिरकने लगते हैं और अब जब ढोल बजने ही लग गया तो समस्या यह आई कि अब वे अपने आप को नाचने से कैसे रोकें? पर जब उन्होंने जैसे ही हिलना-डुलना शुरु किया तो उनके घर वाले उन पर खूब नाराज होने लगे। उन्होंने उनके साथ खून डांट-डपट की, पर वे क्यों मानते? क्योंकि नाचने वाले का पेअर और गाने वाला का मुंह नहीं रुकता। शायद इसीलिए ये भी भला कैसे रुकते। क्योंकि अभी तक तो आप इन्हें अपने लिए नचाते रहे, पर जब आप पर न तो ढोल है और न ही बाजा तो ये आप के साथ कैसे नाचेंगे? अब भला बिना बाजे के भी कोई नाच सकता है और फिर बिना बजे के भला कोई मजा आता है।
इसलिए वे किसी भी तरह रोके से नहीं रुके। भला बाढ़ का पानी कोइ रोकने से रुक सकता है और यह तो बाढ़ नहीं सुनामी थी तो कैसे रुकता? बस अब क्या था अब तो राजा की सवारी में सम्मलित होने की होड़ ही मच गयी। और ऐसी होड़ मची कि अब अपने घर में रहने को कोई तैयार ही नहीं था। सब के सब सवारी में सम्मलित होने को उतावले थे। भेड़ चाल की तरह सब भागने लगे।



उनके घर के मुखिया ने देखा कि जब सब भाग रहे हैं राजा भी जा रहा है रामलू जा रहा है और रोमेश भी जा रहा है तो तुम भी अकेले यहां घुट -घुट कर क्यों मरो तुम भी मजा लो भला यह अवसर फिर कब मिलेगा और अब तो सवारी ही तो निकलनी है, जिसे अब कोई कैसे भी नहीं रोक सकता है। इसलिए उन्होंने भी सवारी में सम्मलित होने के लिए अपने कपड़े लत्ते बदलने शुरू कर दिए। लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि कल तक तो ये ककंड़-पत्थर की मिठाई भेज रहे थे, चांटा मार रहे थे और आज ये ही सवारी में सम्मलित होने जा रहे हैं।
इसलिए राजा के संगी-साथियों ने उनके आने के लिए रास्ता अपने आप छोड़ना शुरू कर दिया। और वे इस तरह राजा की सवारी में सबसे आगे हो गए। तो आप ही बताओ कि राजा के उन पहले वफ़ादार संगी-साथीयों का क्‍या होगा जो दरी बिछाने में लगे थे नारे लगाने में लगे थे क्योंकि अब वे तो अपने आप पीछे होने वाले थे। हे भगवान! उन बेचारों का भी ध्यान रखना।