तीरथ सिंह रावत के लिए चुनौतियों से भरा होगा सफर, ब्यूरोक्रेसी से निबटना सबसे बड़ा काम

आईआईएमटी न्यूज़ डेस्क, ग्रेटर नोएडा



पिछले कई दिनों से उत्तराखंड सियासत में मचे घमासान का आखिर मंगलावार को अंत हो गया, भाजपा विधानमंडल की बैठक में तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद सौंपा गया। बुधवार शाम चार बजे तीरथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन उत्तराखंड की सियासत ने कई दिग्गजों को अर्श से फर्श पर लाकर पटका है जिसका अंदाज़ा पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत से लगाया जा सकता है। सूबे के नए सीएम के लिए यह सफर मुश्किलों भरा होने वाला है, सियासती गलियारों की उठा-पटक कई चुनौतियां पेश करेंगी। बता दें, तीरथ सिंह रावत के लिए सबसे पहली चुनौती उपचुनाव जीतकर विधायक बनना है। तीरथ के विधायक बनने के लिए किसी एक विधायक को इस्तीफा देना होगा। इसके अलावा सुरेंद्र सिंह जीना के निधन से खाली हुई सल्ट सीट भी एक विकल्प है। वहीं, दूसरी तरफ पौढ़ी गढ़वाल के सांसद पद के लिए भी उपचुनाव होंगे जिसमें उनकी साख दांव पर होगी। दूसरी चुनौती के रुप में रावत के सामने 2022 के चुनाव होंगे। उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में कोई भी पार्टी दोबारा सरकार नहीं बना सकी है। खबरों की माने तो बीजेपी उत्तराखंड के रण में नए चेहरे के साथ चुनावों में कूदना चाहती है, इसलिए तीरथ सिंह रावत को सीएम पद सौंपा गया है। तीरथ के समक्ष तीसरी चुनौती ब्यूरोक्रेसी पर नियंत्रण रखना होगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक त्रिवेंद्र सिंह रावत के वक्त ब्यूरोक्रेसी किसी की सुन नहीं रही थी, जिससे पार्टी के नेता और मंत्री नाराज़ थे। अब तीरथ को अपनी सरकार बिना अटकलों के चलाने के निए ब्यूरोक्रेसी पर नियंत्रण रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। चौथी चुनौती के रुप में तीरथ के समक्ष अपनी ही पार्टी है। दरअसल, पिछली कांग्रेस सरकार के वक्त जो विधायक शामिल थे वो अभी भी सरकार में शामिल हैं, जो कि रास्ते का रोड़ा बन सकते हैं। सीएम के लिए सबसे बड़ी मुश्किल उनके समर्थक बन सकते हैं। वहीं, दूसरी ओर तीरथ को पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी से निपटना होगा। पाँचवी चुनौती के रुप में तीरथ को मैदानी इलाकों की राजनीति में पकड़ बनानी होगी। तीरथ पौढ़ी गढ़वाल सीट से सांसद हैं, मैदानी और पहाड़ी इलाकों की सियासत में मौजूद फर्क उनकी राजनीति में अड़चन न पैदा करे इस बात का ध्यान रखना बेहद ज़रुरी होगा।