सामाजिक ताने-बाने में आई दरार को पाटने की दरकार

अनिल निगम
भौतिकतावादी परिवेश और प्रतिस्पर्धा ने पारिवारिक एवं सामाजिक ताने-बाने को तार-तार करना शुरू कर दिया है। अखबारों और टीवी न्यू्ज चैनलों में ये खबरें आम हो गई हैं कि संपत्तिू के लिए बेटे ने बाप, मां या भाई की हत्याे कर दी। इसी तरह से यह देखा जा रहा है कि भाई ने बहन, बाप ने बेटी, ससुर ने बहु के साथ दुष्कयर्म कर रिश्तों को कलंकित कर रहे हैं। निस्सं देह, ऐसा होना भारतीय संस्कृ ति और संयुक्तर परिवार की अवधारणा के पूरी तरह से प्रतिकूल है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वािभाविक है कि भारतीय समाज में संबंधों की मर्यादा और परिवार की एकजुटता क्यों भंग हो रही है? क्यार हमारा समाज दिशाहीन और नेतृत्वाविहीन होता जा रहा है? ये घटनाएं राष्ट्री और समाज के निर्माण में किस तरह से बाधक हैं?
विभिन्नट कारणों की मीमांशा करने के पूर्व यहां पर हाल ही में घटित चंद घटनाओं की चर्चा करना उचित रहेगा। दक्षिणी दिल्ली के खिड़की एक्सटेंशन में 7 नवंबर को 38 वर्षीय सुमित ने मामूली झगड़ों के चलते अपनी पत्नीं की हत्याि कर दी। कुछ इसी तरह हाल ही में दिल्लीच के नजफगढ़ में एक युवक ने अपनी पत्नीं को गला दबाकर मार डाला। 21 अक्टूलबर को उत्तुर प्रदेश के कासगंज में संपत्तित बंटवारा को लेकर हुई गोलीबारी में दो सगे भाईयों की मौत हो गई। पिछले ही महीने उत्तपर प्रदेश के संतकबीर नगर में एक बेटे ने जरा सी बात के लिए अपने पिता को गोली मार दी। कैथल में नाली विवाद को लेकर भतीजे की बहू व उसके बेटे ने एक बुजुर्ग महिला की पीट-पीट कर हत्याी कर दी। इसी तरह से रिश्तों को कलंकित करने वाली दुष्कजर्म की अनेक घटनाएं देश में हाल ही में घटी हैं, जिनका ब्यो रा देना मैं उचित नहीं समझता।
ये घटनाएं आज संयुक्त परिवारों में बिखराव, रक्त संबंधों में बिखराव और रातों-रात सफलता की बुलंदी पर पहुंचने की लालसा जैसे कारणों को प्रदर्शित करती हैं। यूं तो हमारे देश में पारिवारिक और सामाजिक संबंधों में खूनी जंग का भी एक लंबा इतिहास रहा है, लेकिन पूर्व में इस तरह की घटनाएं राजघरानों के आपसी स्वार्थों के टकराने तक ही सीमित रहती थीं। लेकिन आज यह समस्या बेहद गंभीर हो गई है।



वास्तेविकता तो यह है कि संस्कारों की कमी के कारण रिश्तों का क्षरण हो रहा है। परिवारों के अंदर बड़ों और अपनों के लिए मर्यादा और सम्माोन कम हो रहा है। युवा पीढ़ी की निगाह में रिश्ते ज्यादा मायने नहीं रखते हैं। आज संयुक्तय परिवार टूट चुके हैं। गांवों के ज्याजदातार लोग रोजगार की तलाश में शहरों और महानगरों में बस गए हैं। इन महानगरों में सबसे बड़ा संकट यह है कि लोग यहां पर अंजान की तरह रहते हैं। किसी के पास किसी अन्यो के लिए फुर्सत नहीं है। कोई अप्रिय घटना घट जाए तो किसी का साथ मिलेगा भी, इसमें संदेह रहता है। आज लगभग प्रत्येकक व्यरक्तिर असंतुष्ट रहता है। संयुक्त परिवार की पाठशाला में पहले जिस तरह से व्यगक्ति के अंदर संस्काररों की सर्जना की जाती थी, अब वह लगभग विलुप्तत हो चुकी है।
इंटरनेट क्रांति के बाद सोशल मीडिया के माध्यतम से युवाओं के बीच परोसी जा रही सामग्री ने उनको और अधिक संवेदनहीन और संस्कायरविहीन कर दिया है। आज युवाओं का सबसे बड़ा और अच्छाअ दोस्तर उनका स्मादर्टफोन बन गया है। वे परिवार और समाज में रहते हुए भी एक दूसरे के प्रति अजनबी की तरह व्यनवहार करते हैं। यही कारण है कि उनकी सोच और प्रवृत्तिर हिंसक होती जा रही है। यही नहीं, परिवार और समाज में बढ़ते अपराधों के लिए यही चीज जिम्मेहदार हैं। अगर हमारे समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा बढ़ी है और उन्हें उनकी संतानें उनको वृद्धा आश्रम भेज रही हैं तो इसका कारण हमारे पारिवारिक मूल्यों का तिरोहित होना है। पति-पत्नी के बीच या परिवार और समाज के आत्मीय संबंधों को कमजोर करने वाली सभी घटनाएं सीधे-सीधे सामाजिक ढांचे की दीवारों के दरकने का संकेत देती हैं।
किसी भी समाज का निर्माण परिवारों से और राष्ट्रे का निर्माण समाज से मिलकर होता है। युवा वर्ग देश का भविष्य होने के साथ-साथ हमारे देश के विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है। केंद्र सरकार की राष्ट्रीय युवा नीति-2014 का उद्देश्य “युवाओं की क्षमताओं को पहचानना और उसके अनुसार उन्हें अवसर प्रदान कर उन्हें सशक्त बनाना और इसके माध्यम से विश्वभर में भारत को उसका सही स्थान दिलाना है।“ आप कल्पाना कीजिए कि अगर इतनी बड़ी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्साथ मानवीय मूल्योंन, आदर्शों और संस्काइरों का त्याकगकर सिर्फ अपने निहितार्थों को साधने में लग जाए तो भारत को एक सशक्तय और समृद्ध राष्ट्र बनाने का सपना कैसे पूरा होगा। ऐसे में सरकार को वर्तमान शिक्षा प्रणाली में बदलाव करते हुए गंभीर होती इस समस्यान पर अंकुश लगाने की समुचित पहल और प्रयास करना चाहिए।
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(लेखक आईआईएमटी न्यूiज के संपादक हैं।)