निजता का सवाल और खुली दुनिया का सच

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
यह किसी हॉलीवुड फिल्म की कहानी का हिस्सा हो सकता है जिसमें उपग्रहों और इंटरनेट के विभिन्न मंचों के माध्यम से लोगों के निजी जीवन में ताकझांक ही नहीं हो रही है बल्कि उनके जीवन की दिशा और दशा को भी नियंत्रित किया जा रहा है। इस तरह की कहानी को लेकर कुछ फिल्में बनी भी हैं जिनमें से एक ‘द नेट’ थी। ‘डाई हार्ड’ श्रृंखला की तीसरी फिल्म की कहानी भी इसी पर आधारित थी। इस तरह की और कई फिल्में बनी जो उस समय केवल कल्पना लगती थीं। उपग्रह या इंटरनेट हमारे जीवन में नियंत्रणकारी भूमिका में आ जाएंगे यह आज से तीन दशक पहले भी कल्पना भी और आज भी लगती है। उपग्रहों और इंटरनेट ने जब हमारे जीवन में प्रवेश किया उस समय हमें लगा था कि हमारे सामने अब तक बंद दरवाजे खुल गये हैं। हमने खुद को एक खुली दुनिया में पाया।



एक ऐसी दुनिया जिसे हम ठीक से जानने का ही नहीं, उसका हिस्सा होने का दावा भी कर सकते थे। मोबाइल फोन सेवा और सोशल मीडिया ने हमें उस दुनिया का भी हिस्सा बना दिया जहां हमारा वैसे पहुंच पाना संभव नहीं है या जिससे संपर्क बनाना केवल एक कल्पना थी।
आज बिहार या मध्यप्रदेश या किसी भी प्रांत के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाला व्यक्ति अमेरिका या किसी भी मुल्क के लोगों से न केवल संपर्क बना सकता है बल्कि उनके साथ दोस्ती कर सकता है, व्यापारिक या सामाजिक संबंध बना सकता है। एक बंद दुनिया थी जिसे नये संचार माध्यमों ने अचानक हमारे सामने खोल दिया था। इस खुली दुनिया को हमने हाथों-हाथ लिया। एक ऐसी दुनिया जो अधिक लोकतांत्रिक, अधिक स्वतंत्र और गतिशील है। पिछले दो दशकों में यह खुली दुनिया और अधिक खुल गयी है। इसके कारण विभिन्न समाजों में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संरचनाओं में बदलाव भी आया है। यह बदलाव सकारात्मक तो है ही, नकारात्मक भी है। एक तरफ दुनिया के लोग एक-दूसरे के अधिक निकट आ गये हैं तो दूसरी तरफ वह पहले से अधिक दूर भी हो गये हैं। इसका सबसे अधिक नुकसान सामाजिक क्षेत्र में हुआ है। पर यह मुद्दा फिर कभी। फिलहाल हम निजता के सवाल को देखें तो इस खुली दुनिया ने सारे खिड़की-दरवाजों को हटा दिया है। और इस तरह हटा दिया है कि अब कुछ भी निजी नहीं रह गया है।
निजी जीवन में संचार माध्यमों की बढ़ती हस्तक्षेपकारी भूमिका को शुरू में गंभीरता से नहीं लिया गया। पिछले दो साल में कुछ ऐसी खबरें सामने आयीं जिनसे निजता हनन का संकट सामने आया। इतना ही नहीं, निजता हनन के साथ ही सोशल मीडिया के राजनीतिक दुरूपयोग का मामला भी सामने आया। इससे यह प्रश्न एकबार फिर उभरा कि इस खुली दुनिया में क्या कुछ भी निजी रह पाएगा? पिछले दिनों जब भारत सरकार ने सोशल मीडिया पर दी जाने वाली जानकारी या अन्य सूचनाओं की निगरानी के लिए नियम बनाना चाहा तो उसे निजता के हनन का प्रयास कहा गया। उसका इतना विरोध हुआ कि सरकार को कदम वापस खींचने पड़े। इस बीच विभिन्न सोशल मीडिया मंचों से डाटा लीक होने या चोरी होने की खबरें भी आती रहीं। और अब व्हाट्सएप से उपयोगकर्ताओं की जानकारी के चोरी होने का मामला सामने आया है। इस मामले में सरकार की तरफ से कदम उठाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो सरकार लोगों की निजता के हनन के विरोध में है परंतु क्या वास्तव में ऐसा है? इस संशय का कारण है सत्ता का चरित्र। सत्ता चाहे किसी की भी हो, किसी भी विचारधारा की हो, वह हमेशा से अपने हाथ में उन शक्तियों को चाहती है जिनसे वह जनता पर प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष नियंत्रण भी रख सके। यदि सरकार सोशल नेटवर्किंग साइटों को नियंत्रित करने या उनकी निगरानी करने का अधिकार प्राप्त कर लेती है तो उसके लिए उसके उपयोगकर्ताओं को नियंत्रित करना भी आसान हो जाएगा। अभी भी विभिन्न राजनीतिक दलों ने सोशल साइटों पर निगरानी के लिए व्यवस्था कर रखी है। हम भले ही कितने भी आश्वस्त हों परंतु सोशल मीडिया में हम जो कुछ लिखते हैं, पसंद करते हैं, हमारे मित्रों में जो लोग हैं वह कौन हैं, उनकी विचारधारा क्या है आदि पर राजनीतिक दलों की पूरी नजर रहती है। इस तरह से देखें तो हमारी निजता इस खुली दुनिया में एक वास्तविकता न होकर भ्रम है।
इस खुली दुनिया में जब सब कुछ खोलने यानी सबके लिए समान रूप से उपलब्ध कराने की बात की जा रही है वहां निजता का प्रश्न यदि आज भी प्रासंगिक है तो इसलिए कि यह कहीं न कहीं हमारे अस्तित्व का भी प्रमाण है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि एक सामाजिक प्राणी होने के बाद भी प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग सत्ता होती है जिसे बचाये रखना जरूरी है। इसके लिए कोशिश भी होती रहती है परंतु देखा जाए तो ऐसी कोशिशों का कोई खास मतलब नहीं निकलता। कारण कि आज दुनिया में तकनीक हमारे जीवन पर इतनी अधिक प्रभावी हो चुकी है कि एक तरह से उसने हमारे जीवन पर नियंत्रण कर लिया है। आज तकनीक का अपना साम्राज्य है और हम मनुष्य उसके उपनिवेश बने हुए हैं।
बाजार भी एक बड़ी तकनीक है, सिर्फ मशीन ही तकनीक नहीं होती। बाजार जब से सबके लिए खुला है तब से उसके लिए भी सब कुछ खुला है, व्यक्ति का निजी जीवन भी। यही कारण है कि आज आप ऐसे विज्ञापनों को आसानी से देख सकते हैं जो आपके अंतरंग निजी क्षणों में निर्णायक हस्तक्षेप करने का दावा करते हैं। चाहे वह आपकी सुंदरता बढ़ाने का मामला हो या शक्ति, सुख के नये मानक तय करने हों या खुशी की परिभाषा, बाजार की तकनीक इन सबको खोलकर रख देती है। वह उसे खोलती ही नहीं है बल्कि उससे खेलती भी है। व्यक्ति के रूप में हम इस बात से खुश होते हैं कि बाजार हमारे सुखों का ध्यान रखता है परंतु हकीकत में तो बाजार हमें नियंत्रित करने में लगा है। वह हमारी आदतों को बदल रहा है, हमारी पसंद-नापसंद को तय कर रहा है, हमारे सपनों को बदल रहा है, वह हमें कैसे जीना है यह सिखा रहा है। और यह सब करते हुए वह आसानी से हमारे जीवन में घुसकर हमारी निजता को भंग कर देता है, वह भी हमारे संज्ञान में लाये बगैर। हमारी निजता को भंग किये बिना वह हमें अपनी इच्छित दिशा में मोड़ नहीं सकता। इसलिए इस खुली दुनिया में हमारी निजता का सवाल सिर्फ मीडिया से जुड़ा हुआ नहीं है। मीडिया तो बाजार का एक हिस्सा है और उसका औजार भी, पर वास्तविक शक्ति तो बाजार के हाथों में है। यह बाजार है खुली दुनिया का और इसीलिए यह बाजार भी खुलेपन की बात करता है। पर इसके खुलने से हमारा जीवन भी इतना खुलता जा रहा है कि उसमें कुछ भी निजी न रहे इसका खतरा सामने दिखाई देने लगा है।
‘हक से मांगो’ की नसीहत से शुरू हुए इस खुलेपन में बेझिझक मांगो, खुलकर बोलो, सब कुछ मांगो, और अधिक मांगो, कम में संतोष मत करो, और अधिक मांगो जैसी शिक्षाओं अे विज्ञापनों के माध्यम से तो कभी टीवी धारावाहिकों और फिल्मों के माध्यम से हमारे जीवन में रास्ता बनाना शुरू कर दिया है। हमारे जीवन की, उसकी आकांक्षाओं की, उसकी सीमाओं की सभी खिड़कियां खुली हुई हैं। बल्कि कहा जाए कि अब न कोई दीवार है न दरवाजा तो गलत नहीं होगा। सब कुछ खुला हुआ है। बाजार यही खुलापन चाहता है। उसकी यही खुली दुनिया है जिसमें हमारी भूमिका एक ऐसे उपभोक्ता की हो जो बस उपभोग करने पर ध्यान दे और अपनी जेब को खुला रखे। आपकी इच्छाओं को गढ़ने से लेकर उन्हें पूरा करने तक का काम तो बाजार कर ही लेगा। आपकी इच्छाएं, जी हां, आपकी इच्छाएं भी अब आपकी नहीं हैं। हालांकि आप इस बात को मानेंगे नहीं। आप तो यही मानते हैं कि आप यानी मनुष्य इस सृष्टि में सबसे अधिक ताकतवर और बुद्धिमान है। पर भूल गया है कि बाजार जो कभी एक व्यवस्था थी अब तकनीक है और ऐसी तकनीक जिसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है, स्वतंत्र सत्ता है और वह अपना नियंत्रण खुद करता है। हां नियंत्रण करने का भ्रम जरूर वह मनुष्य को देता है परंतु हकीकत में तो वह मनुष्य को नियंत्रित कर रहा है।
इस खुली दुनिया में एक तरफ मनुष्य को बाजार के नियंत्रण में कर दिया गया है तो दूसरी तरफ ऐसी व्यापारिक स्थितियां बना दी गयी हैं कि खुली अर्थव्यवस्था या उदार अर्थनीतियों के सच सामने आने लगते हैं। कभी अमेरिका तो कभी कोई और देश दुनियाभर के बाजार पर अपने नियंत्रण के लिए उन देशों पर विभिन्न तरह के प्रतिबंध लगाते हैं जो उन्हें या तो चुनौती देने की स्थिति में हैं या उनकी शर्तों को मानने को तैयार नहीं हैं। यानी खुली अर्थव्यवस्था और उदार नीतियां केवल दिखावा हैं। इस तरह एक तरफ बाजार लगातार अप्रत्यक्ष रूप से हमारी निजता को भंग करते हुए अपनी इच्छित दिशा में हमें ले जाता है तो दूसरी तरफ संपन्न देश, शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां या बडे़ औद्योगिक घराने नीति निर्माण के स्तर पर देशों की निजता को भंग करते हैं। सोशल मीडिया या ऐसे ही अन्य माध्यमों से व्यक्तिगत निजता को जो खतरा लगातार बढ़ रहा है वह जो अपनी जगह है ही, इन माध्यमों का उपयोग राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक निजता को नष्ट करने के लिए भी किया जाने लगा है।