पानी पानी कितना पानी

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

हिंदुस्तान लीवर का एक विज्ञापन है जिसमें दिखाया गया है कि कैसे गांव में एक बाथरूम लगने पर लोग उसमें फैवारे से पानी पीते हैं। संदेश यह है कि एक तरफ एक शहर वाले का नहाना खत्म नहीं होता जबकि उतने ही पानी से पूरे गांव की प्यास बुझ जाती है। आमतौर पर हमारे समाज में विज्ञापनों को केवल चीजें बेचने का माध्यम माना जाता है जबकि वह सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी हो सकते हैं। पर क्या ऐसा होता है? इस प्रश्न का कारण यह है कि यह और इस तरह के अन्य विज्ञापनों का लोगों पर कितना असर होता है यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। पानी बर्बाद न करने के तमाम विज्ञापनों और संदेशों के बाद भी दिल्ली जैसे महानगर में एक परिवार के लिए कई दिन के पीने के पानी जितने पानी का इस्तेमाल कार धोने में ही नष्ट कर दिया जाता है। लोग नल को खुला छोड़ देते हैं। एक तो देश में पेयजल की कमी ऊपर से जो है उसे भी नष्ट किया जाना समस्या को और भयावह बना देता है। यह समस्या और भी विकट हो जाती है जब सरकारें आंकड़ों की भाषा में लोगों को यह समझाने में सफल हो जाती हैं कि देश में सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति की जा रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में शहरी क्षेत्रों में 9.7 करोड़ लोगों को सुरक्षित पेयजल नहीं मिल पाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी खराब है। विशेषरूप से उन ग्रामीण क्षेत्रों में जो शहरों से दूर हैं या आदिवासी क्षेत्र हैं। सरकारी दावे कुछ भी कहें परंतु इन क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल के स्रोतों का विकास ही नहीं हुआ है। एक अध्ययन के अनुसार 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी अशुद्ध पेयजल पर निर्भर है। स्थिति यह है कि हम शहरी क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता का दावा करते हैं परंतु वहां भी अनधिकृत कालोनियों और झुग्गियों में पेयजल की पर्याप्त आपूर्ति न होने के कारण लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं, शहरी क्षेत्रों में जहां पेयजल आपूर्ति का दावा किया जाता है, वहां भी लोग भूजल पर अधिक आश्रित हैं।

पेयजल के इस संकट का एक बड़ा कारण बढ़ती आबादी और उसके अनुपात में जल संसाधनों की कमी है। 2028 में हम चीन को पछाड़ कर सबसे अधिक आबादी वाले देश हो जाएंगे परंतु इस बढ़ती आबादी के लिए आवश्यक पेयजल की व्यवस्था करने के लिए हमारे पास कोई ठोस नीति नहीं है। 1951 में हमारे यहां प्रति व्यक्ति 4 हजार घनमीटर तक पानी की उपलब्धता थी जो आज 1000 घनमीटर रह गयी है। अमेरिका में यह आंकड़ा 8 हजार घनमीटर है। प्रतिव्यक्ति 1700 घनमीटर से कम उपलब्धता को संकट माना जाता है। इसके साथ ही हमारे देश में जो पानी उपलब्ध है उसकी गुणवत्ता भी बहुत खराब है। जाहिर है कि बढ़ती आबादी की तुलना में हमारे जल संसाधनों में कोई वृद्धि नहीं हुई है।

ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, सोनीपत के वैज्ञानिकों श्रीरूप चौधरी और मिमी रॉय द्वारा किये गये एक अध्ययन में वर्ष 2011 की भारतीय जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके सुरक्षित पेयजल और बुनियादी स्वच्छता के आधार पर पेयजल क्षेत्र का मूल्यांकन किया।



अध्ययन के अनुसार नागरिकों के लिए उपलब्ध पेयजल सुविधाओं में शहरी व ग्रामीण स्तर पर 20 से 45 प्रतिशत तक असमानता है। लगभग 70 प्रतिशत शहरी घरों में पीने के लिए नल का पानी उपयोग किया जाता है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 31 प्रतिशत घरों में ही नल के पानी की सुविधाएं उपलब्ध हैं। वहीं, लगभग 12 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में 50 प्रतिशत से अधिक परिवार भूजल पर आश्रित हैं।

राज्यों में भी पेयजल की उपलब्धता को लेकर अलग-अलग स्थिति है। राजस्थान में 78 प्रतिशत घरों में सुरक्षित पेयजल स्रोत होने के बावजूद 48 प्रतिशत से अधिक लोग पेयजल के लिए भूजल पर निर्भर हैं। राजस्थान के सिर्फ 32 प्रतिशत घरों में ही उपचारित नल का पानी आता है। गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में 39-48 प्रतिशत तथा बिहार, नागालैंड, लक्षद्वीप, असम, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में 15 प्रतिशत से कम परिवारों को नल का उपचारित पानी मिल पाता है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में भूजल की गुणवत्ता सबसे ज्यादा संकटग्रस्त पाई गई है। पूरे भारत में लोग नल, हैंडपंप ट्यूबवेल या बोरवेल, नहर, नदी अथवा नालों, टैंक या तालाब और अन्य स्त्रोत से पेयजल प्राप्त करते हैं।