सत्यानाशी पौधे में हैं कई चमात्कारी गुण

आईआईएमटी न्यूज डेस्क, ग्रेटर नोएडा



सत्यानाशी का फूल, जड़, पत्ते और दूध में बीमारियों का रामबाण उपचार छिपा हैं। इसको कई नामों से पहचाना जाता हैं, जिसमें भटकटैया, स्वर्णक्षीरी शामिल हैं। सत्यानाशी में पाए जाने वाले बैक्टेरिया एंटीमाइक्रोबियल, एंटीडायबिटी, एनोलेज्सिक, एंटी इंफ्लेमेटरी, एंटी स्पास्मोडिक और एंटी ऑक्सीटेंट सहित कई विटामिन के गुण पाए जाते हैं। सत्यानाशी का वानस्पतिक नाम आर्जेमोनि मेक्सीकाना हैं। सत्यानाशी के प्रयोग से दूर होने वाले रोग में रतौंधी जिसमें सत्यानाशी के पौधे से तीन बूंद दूध को एक चम्मच घी में मिलाकर आंखों में लगाने से रतौंधी में आराम मिलता हैं। आंख से जुडी अन्य समस्या के लिए 1 ग्राम दूध को गुलाव जल में मिलाकर लगाने पर समस्या से छुटकारा मिलता है। सांस और खांसी में जड़ के चूर्ण को गाय के दूध में सेवन करने से आराम मिलता हैं। दमें के रोगी को सत्यानाशी के पत्तो का रस उवालकर उसमें गुड़ और राल मिलाकर गोलियां तैयार कर उसका दिन में तीन बार गर्म पानी के साथ सेवन करें। पेटदर्द और जलोदर में सत्यानाशी का दूध और रस दोनो का प्रयोग किया जा सकता हैं। पीलिया रोग में गिलोय और सत्यानाशी का सेवन किया जाता हैं। मूत्र विकार में पत्तों को पानी में डालकर पिलाने से राहत मिलती हैं। सिफलिस और सुजाक में सत्यानाशी के दूध को मक्खन के साथ सेवन किया जाता है। कुष्ठ रोग में पत्ते के रस का सेवन किया जाता हैं। त्वचा रोग में सत्यानाशी का तेल कारगर हैं। घाव सुखाने में पत्तियों का पेस्ट बनाकर लगाने से राहत मिलती हैं। इस्नोफिलिया में चूर्ण का सेवन किया जाता हैं। सत्यानाशी के कारगर पंचांग, पत्ते फूल जड़ तने की छाल दूध होते हैं। प्रयोग की मात्रा चूर्ण 1-3 ग्राम, दूध 5-10, तेल 10-30 और रस 5-10 ग्राम किया जाता हैं। सत्यानाशी के प्रयोग करने में सावधानी का ध्यान रखें। सत्यानाशी के बीजों का प्रयोग शरीर के बाहरी अंग में करें क्योंकि इसमें विषैला बैक्टेरिया होता हैं।

सत्यानाशी का फूल, जड़, पत्ते और दूध में बीमारियों का रामबाण उपचार छिपा हैं। इसको कई नामों से पहचाना जाता हैं, जिसमें भटकटैया, स्वर्णक्षीरी शामिल हैं। सत्यानाशी में पाए जाने वाले बैक्टेरिया एंटीमाइक्रोबियल, एंटीडायबिटी, एनोलेज्सिक, एंटी इंफ्लेमेटरी, एंटी स्पास्मोडिक और एंटी ऑक्सीटेंट सहित कई विटामिन के गुण पाए जाते हैं। सत्यानाशी का वानस्पतिक नाम आर्जेमोनि मेक्सीकाना हैं। सत्यानाशी के प्रयोग से दूर होने वाले रोग में रतौंधी जिसमें सत्यानाशी के पौधे से तीन बूंद दूध को एक चम्मच घी में मिलाकर आंखों में लगाने से रतौंधी में आराम मिलता हैं। आंख से जुडी अन्य समस्या के लिए 1 ग्राम दूध को गुलाव जल में मिलाकर लगाने पर समस्या से छुटकारा मिलता है। सांस और खांसी में जड़ के चूर्ण को गाय के दूध में सेवन करने से आराम मिलता हैं। दमें के रोगी को सत्यानाशी के पत्तो का रस उवालकर उसमें गुड़ और राल मिलाकर गोलियां तैयार कर उसका दिन में तीन बार गर्म पानी के साथ सेवन करें। पेटदर्द और जलोदर में सत्यानाशी का दूध और रस दोनो का प्रयोग किया जा सकता हैं। पीलिया रोग में गिलोय और सत्यानाशी का सेवन किया जाता हैं। मूत्र विकार में पत्तों को पानी में डालकर पिलाने से राहत मिलती हैं। सिफलिस और सुजाक में सत्यानाशी के दूध को मक्खन के साथ सेवन किया जाता है। कुष्ठ रोग में पत्ते के रस का सेवन किया जाता हैं। त्वचा रोग में सत्यानाशी का तेल कारगर हैं। घाव सुखाने में पत्तियों का पेस्ट बनाकर लगाने से राहत मिलती हैं। इस्नोफिलिया में चूर्ण का सेवन किया जाता हैं। सत्यानाशी के कारगर पंचांग, पत्ते फूल जड़ तने की छाल दूध होते हैं। प्रयोग की मात्रा चूर्ण 1-3 ग्राम, दूध 5-10, तेल 10-30 और रस 5-10 ग्राम किया जाता हैं। सत्यानाशी के प्रयोग करने में सावधानी का ध्यान रखें। सत्यानाशी के बीजों का प्रयोग शरीर के बाहरी अंग में करें क्योंकि इसमें विषैला बैक्टेरिया होता हैं।