खंड़-खंड़ होता समाज

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

एक अख़बार में शीर्षक है ‘नीटः ओबीसी छात्र सर्वाधिक चयनित’। इस शीर्षक में हो सकता है कि ज़्यादातर लोगों को कुछ भी अजीब न लगे। इसी प्रकार जब हाल में सम्पन्न लोकसभा चुनाव के बाद विजयी सांसदों का विश्लेषण करते हुए यह बताया गया कि कौन किस जाति का है या धर्म का है तब भी किसी को उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा। उसके बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रिपरिषद का गठन किया तब भी इस बात की चर्चा हुई कि नये मंत्रियों में कौन किस जाति व धर्म का है। पिछले कई साल से हम इस तरह के विश्लेषण के अभ्यस्त हैं। यह बात हमारी मानसिकता में गहरे तक बसा दी गयी है कि हम लोगों को किसी भी उपलब्धि के संदर्भ में मूल्यांकित करते समय उसकी जाति और धर्म को भी आधार बना लेते हैं। भारतीय समाज के लिए यह मानसिकता कितनी खतरनाक है इस बात का हमें जरा भी ध्यान नहीं आता।

सन् 1947 में भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन हुआ और दो देश बने, भारत और पाकिस्तान, बाद में पाकिस्तान का विभाजन हुआ और तीसरा देश बांग्लादेश अस्तित्व में आया। इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप में तीन राष्ट्रीयताओं का अस्तित्व सामने आया। परंतु क्या इस परिक्षेत्र में वास्तव में केवल तीन राष्ट्रीयताएँ ही हैं? यह प्रश्न अनायास नहीं है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के सामाजिक विभाजन को भूल कर यदि हम भारत में देखें तो यहाँ जाति और धर्म के नाम पर आज कई पहचानें सक्रिय हैं। जिस भारतीय समाज की संकल्पना आज़ादी से पूर्व महात्मा गाँधी और अन्य नेताओं ने की थी वह कहीं बहुत पीछे छूट गयी है।

भारत 1947 में एक भौगोलिक और राजनीतिक सच्चाई बना परंतु आज़ादी के सात दशक बाद भी एक सामाजिक सच्चाई नहीं बन पाया है। पिछले सात दशक से पहले नेताओं ने और उसके बाद मीडिया सहित सभी ने भारतीय समाज को सच्चाई बनने की राह में तरह-तरह के रोड़े अटकाए हैं। भारतीय सामाजिक संरचना कुछ इस प्रकार की रही है कि उसमें शुरू से ही जन्म के आधार पर जाति और उसके आधार पर संसाधनों का असमान नहीं बल्कि अन्यायपूर्ण वितरण एक सामान्य बात रही है। यह स्थिति दुनिया के लगभग सभी समाजों में है, उन तथाकथित सभ्य, विकसित और आधुनिक समाजों में भी जिन्हें हम आदर्श मानते रहे हैं। यहाँ तक कि साम्यवादी देशों के समाज भी इस बुराई से बचे नहीं रह सके। इसका प्रमाण हम भारत में बंगाल और केरल आदि राज्यों की सामाजिक संरचना में देख सकते हैं।

हमने संविधान में बराबरी के अधिकार को स्वीकार करते हुए सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था स्वीकार की थी। इसका लक्ष्य समाज में सभी को एक स्तर पर लाना था परंतु यही व्यवस्था आज समाज के विभाजन का ठोस आधार बन गयी है। राजनीतिक लाभ के लिए समाज को बांटने की नीति धीरे-धीरे समाज की मानसिकता में भी समाती चली गयी जबकि उसे खत्म होना चाहिए था। विडंबना यह है कि हमारा प्रबुद्ध वर्ग भी इस मानसिकता का शिकार हो गया है।



मीडिया को हम लोकतंत्र का चौथा खंभा कहते हैं परंतु इस चौथे खंभे में भी अब घुन लगने लगी है अवैचारिकता की घुन जो उसे खोखला कर रहा है। पिछले दिनों इस तरह का अध्ययन किया गया कि मीडिया में दलित व पिछड़े पत्रकारों की संख्या क्या है? इस तरह की सोच का ही नतीजा है कि आज मीडिया भी चाहे नेता हों या विद्यार्थी उन्हें जातीय आधार पर बांट कर देखने का अभ्यस्त होता जा रहा है। इस तरह से समरस और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के संकल्प को हम स्थायी रूप से दफ़्न करने का काम कर रहे हैं। इसीलिए कई बार यह विचार आता है कि क्या वास्तव में हमारे नीति नियंता और बौद्धिक वर्ग एक भारतीय समाज के पक्ष में है? या वह उसका केवल दिखावा है और वह अंदर ही अंदर इस समाज को छत्तीस टुकड़ों में बांटने की स्थायी व्यवस्था कर रहा है। जिस तरह की हमारी मानसिकता है और जैसा समाज हम बना रहे हैं उसमें तो कभी एक भारतीय समाज की संकल्पना मूर्त रूप नहीं ही ले सकेगी।

एक बात हमें याद रखनी चाहिए कि किसी भी चीज को तोड़ना आसान होता है परंतु उसे जोड़ना बहुत मुश्किल होता है। जब हम समाज को और उसमें परस्पर टकराने वाले समूहों को जोड़ने की कोशिश करते हैं तो हमें कई तरह की प्रतिरोधी शक्तियों का मुकाबला करना होता है। सबसे ज्यादा विरोध उन लोगों की तरफ से होता है जो विभाजित समाज में ही अपने हितों की रक्षा देखते हैं। इसके बावजूद यदि हमें दुनिया में एक आर्थिक और सामाजिक शक्ति के रूप में अस्तित्व पाना है तो इस विभाजनकारी मानसिकता को त्यागना ही एकमात्र विकल्प है।