तनाव बोते हम

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

दौड़ते दोनों ही हैं पर उन्हें एक-दूसरे की भूमिका नहीं दी जा सकती। मैं बात कर रहा हूँ पी टी उषा और मिताली राज की। पी टी उषा ट्रैक पर बहुत तेज दौड़ सकती हैं, मिताली राज से कहीं तेज पर क्या हम उनसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह मिताली की तरह रन बना सकती हैं? या क्या हम मिताली राज से यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह ट्रैक पर कोई रिकॉर्ड कायम करके मैडल जीत सकती हैं? दोनों की अपनी क्षमताएँ हैं और सीमाएँ भी। और दोनों के सपने भी अलग हैं। फिर क्यों हममें से ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों की क्षमता और इच्छा जाने बगैर उनसे एक ही जैसे परिणाम की उम्मीद करते हैं।

पिछले दिनों सीबीएसई के दसवीं और बारहवीं परीक्षा के परिणाम आये। हर तरफ खुशी थी। दोनों परीक्षाओं में कई टॉपर बने वह भी एक समान अंक प्राप्त कर। कई लोगों के लिए यह हैरत की बात रही कि एक साथ कई बच्चों को एक समान अंक आये। दसवीं में तो कमाल हो गया कि तेरह बच्चों ने एक समान 500 में से 499 अंक प्राप्त किये। परिणाम आने से पहले बहुत तनाव था। परिणाम आते ही तनाव छट गया क्योंकि इस बार सफलता का प्रतिशत बहुत अच्छा रहा। पर तनाव छंटने के साथ ही फिर बढ़ने भी लगा है। अब अगली क्लास की तैयारी। दसवीं में हैं तो बारहवीं का तनाव। बारहवीं कर चुके हैं तो कॉलेज का तनाव। मनपसंद कॉलेज में मनपसंद विषय में प्रवेश मिलने का तनाव। यह माना जा रहा है कि आज छात्रों के जीवन में जो तनाव है उसका मुख्य कारण पढ़ाई है। पर यह धारणा गलत है। पढ़ाई तनाव का एक कारण हो सकती है पर सर्वस्व नहीं। कारण कि हमने अपने जीवन में तनाव बोने के लिए कई आधार बना लिये हैं। जहाँ तक पढ़ाई का सवाल है तो वह ऐसा कारण नहीं है जो तनाव का कारण बने। वह तनाव का कारण तब बनता है जब हम उसमें बहुत अधिक अपेक्षाएँ करते हैं। आज स्थिति यह है कि पढ़ने-लिखने में जो बच्चे औसत हैं उनके अभिभावक भी उनसे टॉपर की उम्मीद रखते हैं। इस उम्मीद को पूरा करने के लिए वह बच्चों पर अतिरिक्त दबाव बनाते हैं। उनका ऐसा करना गलत भी नहीं है क्योंकि माता-पिता हमेशा अपने बच्चों के भविष्य की बेहतरी के बारे में सोचते हैं। और बेहतर भविष्य को लेकर यह चिंता ही हमारे समाज में तनाव का मुख्य कारण बन गयी है।



समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। हमारा रहन-सहन, हमारे सपने, हमारी प्राथमिकताएँ सब बदल जाती हैं। आज के अभिभावक आवास, वाहन, खान-पान, पहनावा आदि को लेकर अक्सर आक्रामक स्वभाव रखते हैं। यही स्वभाव उस समय और तीव्र हो जाता है जब हम अपने बच्चों से कुछ चाहते हैं, बिना यह सोचे कि बच्चे क्या चाहते हैं। दरअसल भारतीय समाज की एक बड़ी परेशानी यह है कि यहाँ अक्सर बच्चों पर बड़े अपनी इच्छाओं को थोपते हैं, बगैर यह सोचे कि बच्चे भी कुछ चाह सकते हैं। कई बार तो बच्चों की वह चाहत भी हमें पसंद नहीं आती जो आमतौर पर हमारी रजामंदी से बनी होती है। उदाहरण के लिए हम बच्चों से चाहते हैं कि तकनीक के मामले में हमेशा उन्नत रहें परंतु उनका मोबाइल पर या कंप्यूटर पर अधिक समय बिताना हमें पसंद नहीं आता। यानी हम बच्चों पर अपनी इच्छा से कोई चीज थोपते हैं परंतु उसके बाद की स्थितियों को नकारते भी हैं। अभिभावकों का यह दोहरा स्तर बच्चों के जीवन में लगातार हस्तक्षेप करता है जिसके कारण रिश्तों में भी अंतर आने लगता है। पिछले कुछ समय में घर से भागे बच्चों के बयानों से पता चला कि परीक्षा परिणामों के डर से भागे थे या उन पर पढ़ाई का बहुत बोझ है और माता-पिता इस बात को लेकर अक्सर उन्हें डांटते रहते हैं। पिछले मार्च में पंजाब में एक छात्र ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसे लगता था कि बोर्ड की परीक्षा के लिए उसकी तैयारी पूरी नहीं है। यह और ऐसे तमाम प्रकरण जहाँ प्रमाणित करते हैं कि पढ़ाई का दबाव तनाव का बड़ा कारण है वहीं साथ में अन्य कारण भी हैं।


आज के समय में माता-पिता ही नहीं, बच्चों में भी आकांक्षाएँ बढ़ती जा रही है। जीवन में बढ़ती प्रतियोगिता तो उन्हें तनाव देती ही है। यह प्रतियोगिता शिक्षा के साथ ही अन्य मामलों में भी बढ़ती जा रही है। एक-दूसरे के पास नया मोबाइल, नये कपड़े, किसी रेस्तरां में खाना, कार या बाइक होना ऐसे कुछ कारण हैं जो पढ़ाई के अलावा तनाव के कारण बनते हैं। बच्चों में जब इन सबको लेकर तनाव उत्पन्न होता है तो वह जीवन के अन्य पक्षों को भी प्रभावित करता है। इसके लिए हम बच्चों को दोष नहीं दे सकते। उनकी समझ इतनी नहीं होती है कि वह स्थितियों का ठीक से मुल्यांकन कर सकें। जीवन का अनुभव भी उनके पास नहीं होता और न ही संसाधनों को साध पाने की शक्ति। यह सब माता-पिता के पास होता है परंतु अति-महत्वाकांक्षाओं के कारण वह स्थिति को नियंत्रित करने की बजाय अनियंत्रित कर देते हैं और बच्चों के साथ ही फिर खुद भी तनाव के शिकार हो जाते हैं। ऐसे में बेहतर यही है कि बच्चे ही नहीं, अभिभावक भी इस स्थिति को समझें और बच्चों की क्षमता को देखते हुए उनके जीवन को और इस तरह अपने जीवन को भी सही आकार दें।