रामशंकर, आईआईएमटी न्यूज। नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। दिल्ली सरकार ने हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक आधारित बसों के संचालन का दायरा बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस पहल के तहत दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी), राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) और अन्य संबंधित एजेंसियों के सहयोग से दो नई हाइड्रोजन फ्यूल सेल बसों को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सड़कों पर उतारा जाएगा।
दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन पहले से ही दो हाइड्रोजन फ्यूल सेल बसों का सफल संचालन कर रहा है। इसी अनुभव के आधार पर अब इस तकनीक को व्यापक सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क में शामिल करने की योजना बनाई जा रही है। सरकार का मानना है कि हाइड्रोजन आधारित परिवहन प्रणाली भविष्य में प्रदूषण कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
प्रस्तावित परियोजना के तहत बसों का संचालन ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट (जीसीसी) मॉडल पर किया जाएगा। इस मॉडल में निजी ऑपरेटर बसों का संचालन करेंगे, जबकि किराया और राजस्व प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकारी एजेंसियों के पास रहेगी। इससे परिवहन सेवाओं की गुणवत्ता और दक्षता में सुधार की उम्मीद है।
हाइड्रोजन फ्यूल सेल बसों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके संचालन से कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन नहीं होता। इनके एग्जॉस्ट से केवल जलवाष्प निकलती है, जिससे वायु प्रदूषण में कमी आती है। विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ते प्रदूषण से जूझ रही दिल्ली के लिए यह तकनीक काफी लाभकारी साबित हो सकती है।
परिवहन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद भविष्य में हाइड्रोजन बसों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। इसके साथ ही हाइड्रोजन ईंधन की आपूर्ति, भंडारण और रिफ्यूलिंग से जुड़ा आवश्यक ढांचा भी विकसित किया जाएगा।
दिल्ली सरकार की यह पहल केंद्र सरकार के राष्ट्रीय हरित ऊर्जा लक्ष्यों के अनुरूप मानी जा रही है। देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के साथ-साथ हाइड्रोजन आधारित परिवहन को भी भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल रहती है तो दिल्ली देश के उन प्रमुख शहरों में शामिल हो सकती है, जहां सार्वजनिक परिवहन में हाइड्रोजन तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाएगा। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में भी मदद मिलेगी।

